हेल्थ डेस्क: आंखें हमारे शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग हैं, लेकिन बढ़ती उम्र के साथ आंखों से जुड़ी बीमारियों का खतरा भी बढ़ जाता है। इनमें मोतियाबिंद (Cataract) और काला मोतियाबिंद (Glaucoma) सबसे आम समस्याओं में शामिल हैं। हालांकि, अधिकांश लोग इन दोनों बीमारियों को एक ही समझते हैं, जबकि चिकित्सा विज्ञान के अनुसार दोनों पूरी तरह अलग-अलग बीमारियां हैं। इन्हीं विषयों पर AMD News की Chief Editor सलोनी तिवारी ने वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शालिनी मोहन से विशेष बातचीत की। इस दौरान डॉ. मोहन ने दोनों बीमारियों के कारण, लक्षण, बचाव और उपचार के बारे में विस्तार से जानकारी दी।
डॉ. शालिनी मोहन ने बताया कि मोतियाबिंद एक ऐसी स्थिति है, जिसमें आंख का प्राकृतिक लेंस धीरे-धीरे धुंधला हो जाता है। इसके कारण व्यक्ति को साफ दिखाई देना कम होने लगता है। बढ़ती उम्र इसके होने का सबसे बड़ा कारण है, लेकिन मधुमेह, आंख में चोट, लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं का सेवन और कुछ जन्मजात कारणों से भी यह समस्या हो सकती है। मोतियाबिंद होने पर मरीज को धुंधला दिखाई देना, रात में देखने में परेशानी होना, रोशनी के आसपास चमक महसूस होना, चश्मे का नंबर बार-बार बदलना और रंग फीके दिखाई देने जैसे लक्षण महसूस हो सकते हैं।
उन्होंने बताया कि मोतियाबिंद का इलाज केवल ऑपरेशन से संभव है। आज की आधुनिक तकनीकों की मदद से यह सर्जरी कुछ ही मिनटों में सुरक्षित तरीके से की जाती है और मरीज जल्द ही सामान्य जीवन में लौट सकता है।
डॉ. मोहन ने बताया कि काला मोतियाबिंद, जिसे चिकित्सा भाषा में ग्लूकोमा (Glaucoma) कहा जाता है, आंख की ऑप्टिक नर्व को प्रभावित करने वाली गंभीर बीमारी है। इसमें आंख के अंदर का दबाव बढ़ने से दृष्टि तंत्रिका को नुकसान पहुंच सकता है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि शुरुआती अवस्था में इस बीमारी के कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखाई देते, इसलिए इसे “Silent Thief of Sight” भी कहा जाता है।
उन्होंने कहा कि जैसे-जैसे बीमारी बढ़ती है, मरीज की साइड से देखने की क्षमता कम होने लगती है। कुछ मामलों में आंखों में दर्द, सिरदर्द, उल्टी, रोशनी के चारों ओर इंद्रधनुष जैसे घेरे दिखाई देना और अचानक दृष्टि धुंधली होना जैसे लक्षण भी सामने आ सकते हैं। यदि समय रहते इसका इलाज न कराया जाए तो मरीज की आंखों की रोशनी हमेशा के लिए जा सकती है।
डॉ. शालिनी मोहन ने स्पष्ट किया कि काला मोतियाबिंद से जो दृष्टि क्षति हो जाती है, उसे वापस नहीं लाया जा सकता, लेकिन समय पर जांच, दवाओं, लेजर या सर्जरी की मदद से बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। इसलिए नियमित नेत्र परीक्षण बेहद जरूरी है।
उन्होंने सलाह दी कि 40 वर्ष से अधिक आयु के सभी लोगों, मधुमेह और उच्च रक्तचाप के मरीजों, जिनके परिवार में ग्लूकोमा का इतिहास रहा हो तथा लंबे समय तक स्टेरॉयड दवाओं का उपयोग करने वाले लोगों को समय-समय पर आंखों की जांच अवश्य करानी चाहिए।
डॉ. मोहन ने लोगों से संतुलित आहार लेने, धूम्रपान से बचने, मधुमेह और रक्तचाप को नियंत्रित रखने तथा आंखों में किसी भी प्रकार की परेशानी होने पर बिना देरी किए नेत्र विशेषज्ञ से परामर्श लेने की अपील की।
इस अवसर पर AMD News की Chief Editor सलोनी तिवारी ने कहा कि आंखों से जुड़ी बीमारियों के प्रति जागरूकता बेहद आवश्यक है। समय पर जांच और सही उपचार से कई गंभीर समस्याओं से बचा जा सकता है। उन्होंने लोगों से अपील की कि आंखों की छोटी-सी परेशानी को भी नजरअंदाज न करें और नियमित रूप से नेत्र परीक्षण कराते रहें।

