अंतरराष्ट्रीय योग दिवस: क्या योग केवल सेल्फी, इवेंट और फोटो तक सीमित होकर रह गया है?

संपादकीय डेस्क: हर वर्ष 21 जून को पूरे विश्व में अंतरराष्ट्रीय योग दिवस बड़े उत्साह के साथ मनाया जाता है। भारत सहित दुनिया के अनेक देशों में योग से जुड़े कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। पार्कों, स्कूलों, कॉलेजों, सरकारी कार्यालयों, सामाजिक संस्थाओं और विभिन्न संगठनों द्वारा सामूहिक योगाभ्यास कराया जाता है। इन आयोजनों की तस्वीरें और वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से साझा किए जाते हैं। लेकिन एक महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि क्या योग दिवस अब केवल सेल्फी, फोटो और इवेंट तक सीमित होकर रह गया है? क्या योग का वास्तविक उद्देश्य कहीं पीछे छूटता जा रहा है?

योग भारत की प्राचीन सांस्कृतिक और आध्यात्मिक विरासत है। यह केवल शरीर को स्वस्थ रखने का माध्यम नहीं, बल्कि मन, बुद्धि और आत्मा को संतुलित करने की एक संपूर्ण जीवनशैली है। योग का अर्थ है जोड़ना—शरीर, मन और आत्मा का मिलन। महर्षि पतंजलि द्वारा प्रतिपादित योग दर्शन का उद्देश्य मनुष्य को आत्मिक शांति और जीवन में संतुलन प्रदान करना है। लेकिन वर्तमान समय में योग दिवस का स्वरूप धीरे-धीरे बदलता दिखाई दे रहा है।

योग दिवस की बढ़ती लोकप्रियता

वर्ष 2015 में संयुक्त राष्ट्र द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किए जाने के बाद योग को वैश्विक पहचान मिली। भारत के लिए यह गर्व का विषय था कि उसकी प्राचीन परंपरा को दुनिया ने अपनाया। इसके बाद हर साल बड़े-बड़े आयोजन होने लगे। हजारों लोगों के सामूहिक योग कार्यक्रम, रिकॉर्ड बनाने की कोशिशें और विभिन्न संस्थाओं की भागीदारी ने योग दिवस को एक बड़े उत्सव का रूप दे दिया।

योग के प्रचार-प्रसार के लिए यह सकारात्मक कदम था। इससे लाखों लोग योग के बारे में जान पाए और कई लोगों ने इसे अपने जीवन का हिस्सा भी बनाया। लेकिन समय के साथ इस उत्सव में दिखावे का तत्व भी बढ़ता गया।

सोशल मीडिया का प्रभाव

आज का दौर सोशल मीडिया का है। किसी भी कार्यक्रम की सफलता अक्सर इस बात से मापी जाती है कि उसकी तस्वीरें और वीडियो कितने लोगों तक पहुंचे। योग दिवस भी इससे अछूता नहीं रहा।

सुबह योग कार्यक्रम में भाग लेने के बाद लोग सबसे पहले अपनी तस्वीरें फेसबुक, इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप और अन्य प्लेटफॉर्म पर साझा करते हैं। कई बार ऐसा लगता है कि योग करने से अधिक महत्व उसकी फोटो पोस्ट करने को दिया जा रहा है। कुछ लोग पूरे वर्ष योग नहीं करते, लेकिन 21 जून को योगासन करते हुए तस्वीर खिंचवाकर सोशल मीडिया पर डालना नहीं भूलते।

इस प्रवृत्ति ने योग के मूल उद्देश्य को कहीं न कहीं कमजोर किया है। योग आत्म-अनुशासन और नियमित अभ्यास का विषय है, जबकि सोशल मीडिया संस्कृति तात्कालिक प्रदर्शन और लाइक्स प्राप्त करने पर केंद्रित होती जा रही है।

एक दिन का उत्साह, पूरे वर्ष की उपेक्षा

योग दिवस के अवसर पर पार्कों और मैदानों में बड़ी संख्या में लोग दिखाई देते हैं। लेकिन अगले ही दिन वही स्थान खाली नजर आते हैं। यह स्थिति बताती है कि बहुत से लोगों के लिए योग अभी भी एक दिन का कार्यक्रम भर है।

वास्तव में योग का लाभ तभी मिलता है जब इसे नियमित रूप से किया जाए। एक दिन योगासन करने से न तो शरीर स्वस्थ हो सकता है और न ही मानसिक तनाव दूर हो सकता है। इसके लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है। लेकिन अधिकांश लोग योग दिवस को एक औपचारिक आयोजन के रूप में देखते हैं और उसके बाद अपनी पुरानी दिनचर्या में लौट जाते हैं।

सरकारी और संस्थागत आयोजनों की वास्तविकता

योग दिवस पर सरकारी विभागों, स्कूलों, कॉलेजों और निजी संस्थानों में विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इन आयोजनों का उद्देश्य लोगों को योग के प्रति जागरूक करना होता है। लेकिन कई बार यह केवल औपचारिकता बनकर रह जाता है।

कई कर्मचारी और विद्यार्थी केवल उपस्थिति दर्ज कराने के लिए कार्यक्रम में शामिल होते हैं। कुछ लोग कार्यक्रम समाप्त होने तक फोटो खिंचवाने और मीडिया कवरेज प्राप्त करने में अधिक रुचि दिखाते हैं। आयोजन के बाद योग को जीवन में अपनाने के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए जाते।

यदि संस्थाएं वास्तव में योग को बढ़ावा देना चाहती हैं, तो उन्हें वर्षभर योग प्रशिक्षण, स्वास्थ्य जागरूकता अभियान और नियमित अभ्यास की व्यवस्था करनी चाहिए।

योग का व्यावसायीकरण

पिछले कुछ वर्षों में योग का व्यवसायीकरण भी तेजी से बढ़ा है। योग दिवस के आसपास विभिन्न कंपनियां, ब्रांड और संस्थाएं अपने प्रचार के लिए योग का उपयोग करती हैं। कई स्थानों पर योग कार्यक्रमों का उद्देश्य स्वास्थ्य जागरूकता से अधिक ब्रांड प्रमोशन दिखाई देता है।

योग मैट, योग ड्रेस, हेल्थ प्रोडक्ट्स और अन्य वस्तुओं के प्रचार में योग को एक बाजारू उत्पाद की तरह प्रस्तुत किया जाने लगा है। जबकि योग का मूल स्वरूप सादगी, अनुशासन और आत्म-विकास पर आधारित है।

युवाओं के लिए योग का महत्व

आज के समय में युवाओं के सामने तनाव, अवसाद, मोबाइल की लत, अनियमित दिनचर्या और शारीरिक निष्क्रियता जैसी अनेक चुनौतियां हैं। देर रात तक मोबाइल और सोशल मीडिया का उपयोग, पर्याप्त नींद की कमी तथा बढ़ता मानसिक दबाव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव डाल रहा है।

ऐसी परिस्थितियों में योग युवाओं के लिए एक प्रभावी समाधान बन सकता है। नियमित योगाभ्यास न केवल शरीर को स्वस्थ रखता है बल्कि मानसिक एकाग्रता, आत्मविश्वास और सकारात्मक सोच को भी बढ़ाता है। लेकिन इसके लिए योग को केवल एक वार्षिक आयोजन नहीं, बल्कि दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना होगा।

योग का वास्तविक संदेश

योग हमें केवल आसन करना नहीं सिखाता। यह जीवन को संतुलित तरीके से जीने की कला सिखाता है। योग में यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि जैसे आठ अंग शामिल हैं। इनमें अनुशासन, नैतिकता, आत्मसंयम और मानसिक शांति का संदेश निहित है।

यदि कोई व्यक्ति केवल योगासन की फोटो खिंचवाता है लेकिन अपने जीवन में तनाव, क्रोध, असंतुलन और अनियमितता को नहीं बदलता, तो वह योग के वास्तविक अर्थ को नहीं समझ पाया है।

समाज को क्या करना चाहिए?

योग दिवस को केवल एक औपचारिक उत्सव बनाने के बजाय इसे स्वास्थ्य क्रांति का माध्यम बनाया जाना चाहिए। इसके लिए कुछ कदम महत्वपूर्ण हैं—

  • योग को स्कूलों और कॉलेजों की नियमित गतिविधियों में शामिल किया जाए।
  • कार्यालयों में सप्ताह में एक या दो दिन योग सत्र आयोजित किए जाएं।
  • सोशल मीडिया पर केवल तस्वीरें साझा करने के बजाय नियमित अभ्यास को प्रोत्साहित किया जाए।
  • परिवार के सभी सदस्य प्रतिदिन कुछ समय योग के लिए निकालें।
  • योग को फैशन नहीं, बल्कि जीवनशैली के रूप में अपनाया जाए।

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