Saloni Tiwari – (Chief Editor) – चित्रकूट। भारत की धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा में कुछ ऐसे तीर्थ स्थल हैं, जिनका महत्व केवल मंदिरों तक सीमित नहीं है, बल्कि वहां की मिट्टी, पर्वत, नदी और वनस्पतियां भी श्रद्धालुओं के लिए पूजनीय होती हैं। उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित चित्रकूट ऐसा ही एक पवित्र धाम है। रामायण काल से जुड़ा यह तीर्थ भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण के वनवास की स्मृतियों को संजोए हुए है। चित्रकूट के हृदय में विराजमान हैं भगवान कामतानाथ, जिन्हें चित्रकूट का अधिष्ठाता देव माना जाता है। मान्यता है कि जो श्रद्धालु सच्चे मन से भगवान कामतानाथ के दर्शन और कामदगिरि पर्वत की परिक्रमा करता है, उसकी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
कौन हैं भगवान कामतानाथ?
भगवान कामतानाथ को भगवान श्रीराम का ही स्वरूप माना जाता है। चित्रकूट में स्थित कामदगिरि पर्वत को स्वयं भगवान राम का शरीर माना जाता है और इसी कारण यहां की परिक्रमा का विशेष महत्व है। “कामतानाथ” शब्द का अर्थ है – मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाले भगवान। श्रद्धालुओं का विश्वास है कि भगवान कामतानाथ अपने भक्तों की हर उचित इच्छा को पूर्ण करते हैं और जीवन के संकटों को दूर करते हैं।
रामायण से जुड़ा है कामतानाथ का महत्व
वाल्मीकि रामायण और लोक परंपराओं के अनुसार, भगवान श्रीराम ने अपने 14 वर्ष के वनवास का एक बड़ा समय चित्रकूट में व्यतीत किया था। चित्रकूट की पावन धरती पर ही भरत और श्रीराम का ऐतिहासिक मिलन हुआ था, जिसे आज “भरत मिलाप” के रूप में जाना जाता है। माना जाता है कि श्रीराम, सीता और लक्ष्मण ने कामदगिरि पर्वत के आसपास निवास किया था। इसी कारण यह पर्वत और यहां विराजमान भगवान कामतानाथ करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था का केंद्र बन गए।
कामदगिरि पर्वत: चित्रकूट की आत्मा
चित्रकूट आने वाले श्रद्धालुओं के लिए कामदगिरि पर्वत सबसे प्रमुख तीर्थ माना जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार कामदगिरि ही चित्रकूट की आत्मा है। लगभग 5 किलोमीटर लंबी परिक्रमा श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक शांति और भगवान की कृपा प्रदान करती है। परिक्रमा मार्ग उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश दोनों राज्यों से होकर गुजरता है और पूरे मार्ग में अनेक मंदिर, आश्रम और धार्मिक स्थल स्थित हैं।
कामदगिरि का अर्थ है – “कामनाओं को पूर्ण करने वाला पर्वत”। श्रद्धालु नंगे पैर परिक्रमा करते हुए “जय श्रीराम” और “जय कामतानाथ” के जयकारे लगाते हैं। माना जाता है कि श्रद्धा और भक्ति से की गई परिक्रमा व्यक्ति के जीवन के दुख, कष्ट और बाधाओं को दूर करती है।
कामतानाथ मंदिर का महत्व
कामतानाथ मंदिर चित्रकूट के सबसे प्रमुख मंदिरों में से एक है। यह मंदिर कामदगिरि परिक्रमा का प्रारंभ और समापन स्थल माना जाता है। श्रद्धालु सबसे पहले भगवान कामतानाथ के दर्शन करते हैं और उसके बाद परिक्रमा आरंभ करते हैं। परिक्रमा पूर्ण होने के बाद पुनः मंदिर में आकर भगवान का आशीर्वाद प्राप्त किया जाता है।
मंदिर परिसर में दिनभर भजन, कीर्तन और पूजा-अर्चना का वातावरण बना रहता है। विशेष पर्वों पर यहां लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है।
कामदगिरि परिक्रमा का धार्मिक महत्व
हिंदू धर्म में परिक्रमा को अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। चित्रकूट की कामदगिरि परिक्रमा का महत्व तो और भी अधिक बताया गया है। मान्यता है कि यहां की परिक्रमा करने से मनुष्य के पापों का नाश होता है और उसे आध्यात्मिक उन्नति प्राप्त होती है।
परिक्रमा मार्ग में कई महत्वपूर्ण धार्मिक स्थल आते हैं, जिनमें प्रमुख हैं—
- प्राचीन मुखारविंद
- भरत मिलाप मंदिर
- द्वितीय मुखारविंद
- वराह हनुमान मंदिर
- श्रीराम चरण पादुका
- लक्ष्मण पहाड़ी
इन स्थलों के दर्शन से श्रद्धालुओं को भगवान राम के वनवास काल की घटनाओं का स्मरण होता है।
अमावस्या पर उमड़ता है श्रद्धा का सागर
चित्रकूट में प्रत्येक अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है। इस दिन लाखों श्रद्धालु देश के विभिन्न राज्यों से चित्रकूट पहुंचते हैं और कामदगिरि की परिक्रमा करते हैं। विशेष रूप से सोमवती अमावस्या, दीपावली, रामनवमी और मकर संक्रांति पर यहां भारी संख्या में भक्तों का आगमन होता है।
अमावस्या की रात और अगले दिन चित्रकूट का वातावरण पूरी तरह भक्तिमय हो जाता है। मंदिरों में घंटियों की ध्वनि, राम नाम के जयकारे और भजनों की गूंज श्रद्धालुओं को आध्यात्मिक आनंद से भर देती है।
रामघाट और मंदाकिनी का संबंध
कामतानाथ दर्शन के साथ श्रद्धालु रामघाट भी अवश्य जाते हैं। मंदाकिनी नदी के तट पर स्थित रामघाट चित्रकूट का सबसे प्रसिद्ध घाट है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम, माता सीता और लक्ष्मण यहां स्नान और पूजा करते थे। शाम की भव्य आरती श्रद्धालुओं को मंत्रमुग्ध कर देती है।
तुलसीदास और चित्रकूट
चित्रकूट का संबंध महान संत गोस्वामी तुलसीदास से भी जुड़ा हुआ है। लोक मान्यता के अनुसार तुलसीदास जी को चित्रकूट में भगवान श्रीराम के दर्शन हुए थे। प्रसिद्ध दोहा—
“चित्रकूट के घाट पर, भई संतन की भीर।
तुलसीदास चंदन घिसें, तिलक देत रघुबीर।।”
आज भी चित्रकूट के घाट और मंदिर इस ऐतिहासिक एवं आध्यात्मिक विरासत के साक्षी हैं।
आध्यात्मिकता और प्रकृति का अद्भुत संगम
चित्रकूट केवल धार्मिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि प्राकृतिक सौंदर्य के कारण भी विशेष पहचान रखता है। घने वन, पर्वत, झरने, गुफाएं और मंदाकिनी नदी यहां की सुंदरता को और बढ़ाते हैं। कामदगिरि परिक्रमा के दौरान श्रद्धालु प्रकृति और अध्यात्म दोनों का अनुभव करते हैं।
श्रद्धालुओं के लिए संदेश
भगवान कामतानाथ केवल मनोकामनाएं पूर्ण करने वाले देवता ही नहीं, बल्कि भक्ति, त्याग, मर्यादा और धर्म के प्रतीक भी हैं। चित्रकूट आने वाला प्रत्येक श्रद्धालु यहां से मानसिक शांति, आध्यात्मिक ऊर्जा और नई प्रेरणा लेकर लौटता है। कामतानाथ की परिक्रमा केवल पैरों से किया जाने वाला सफर नहीं, बल्कि आत्मा की यात्रा भी है।

