सलोनी तिवारी: अहोई अष्टमी का व्रत हर साल दिवाली से ठीक आठ दिन पहले रखा जाता है। इस वर्ष यह व्रत सोमवार, 13 अक्टूबर 2025 को मनाया जाएगा।
पंचांग के अनुसार इस दिन कई शुभ योग बन रहे हैं जिनमें शिव योग, सिद्ध योग, परिघ योग और रवि योग का संयोग शामिल है।
-
अष्टमी तिथि प्रारंभ: 13 अक्टूबर, रात 12:14 बजे से
-
अष्टमी तिथि समाप्त: 14 अक्टूबर, सुबह 11:09 बजे तक
-
अहोई अष्टमी पूजा मुहूर्त: शाम 05:53 से 07:08 तक
-
तारों को देखने का समय: शाम 06:17 बजे तक
अहोई अष्टमी व्रत का महत्व
अहोई अष्टमी व्रत कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है। यह व्रत विशेष रूप से माताओं द्वारा अपनी संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य और उज्ज्वल भविष्य के लिए किया जाता है। इस दिन माताएं निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को अहोई माता की पूजा कर तारों को अर्घ्य देकर व्रत का समापन करती हैंअहोई अष्टमी की व्रत कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, एक स्त्री जंगल में मिट्टी खोदते समय अनजाने में एक सेही (स्याहू) के बच्चे को मार देती है। क्रोधित होकर सेही उसे श्राप देती है कि उसके भी बच्चे न रहें। स्त्री दुखी होकर अहोई माता की आराधना करती है और क्षमा मांगती है। माता की कृपा से उसका पुत्र पुनः जीवित हो जाता है। तभी से यह व्रत संतान की रक्षा और दीर्घायु के लिए किया जाने लगा।
अहोई अष्टमी की पूजा विधि
-
सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और सूर्य देव को अर्घ्य दें।
-
निर्जला व्रत का संकल्प लें।
-
शाम को शुभ मुहूर्त में अहोई माता की प्रतिमा या चित्र के सामने दीपक जलाएं।
-
अहोई माता, सेही और अपने बच्चों का स्मरण करते हुए पूजन और कथा श्रवण करें।
-
तारों को देखकर अर्घ्य दें और फिर व्रत का समापन करें।
अहोई अष्टमी का आध्यात्मिक संदेश
अहोई अष्टमी व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह एक मां के निस्वार्थ प्रेम, त्याग और संतान के कल्याण की मंगल कामना का प्रतीक है।
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। अंशिका मीडिया किसी भी प्रकार की पुष्टि नहीं करता। किसी भी मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।


