सलोनी तिवारी: आज का बच्चा कल से बिल्कुल अलग है। डिजिटल युग, तेज़ रफ्तार जीवनशैली और बदलते सामाजिक वातावरण ने बच्चों के सोचने-समझने के ढंग, खानपान की आदतों और करियर की दिशा को गहराई से प्रभावित किया है।
— डॉ. स्नेहलता उमराव
चाइल्ड साइकोलॉजी एंड पेरेंटिंग एक्सपर्ट
एक प्रिंसिपल और चाइल्ड साइकोलॉजी व पेरेंटिंग एक्सपर्ट होने के नाते मेरा अनुभव बताता है कि अब पैरेंटिंग केवल बच्चों की शिक्षा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह उनके मानसिक स्वास्थ्य, पोषण, सामाजिक व्यवहार और भविष्य की दिशा से गहराई से जुड़ चुकी है।
बच्चों में बदलते व्यवहार
पहले बच्चे खेलकूद, परिवार और पड़ोस से सामाजिकता सीखते थे। लेकिन आज वे वर्चुअल दुनिया में ज़्यादा सक्रिय हैं। संवाद और धैर्य की कमी देखी जा रही है। “इंस्टेंट रिज़ल्ट” की आदत ने उन्हें असफलता सहने में कमजोर बना दिया है। यदि बच्चों को सही दिशा में सामाजिक मूल्य नहीं दिए गए तो आने वाली पीढ़ी संवेदनशीलता और सहयोग से दूर हो जाएगी।
खानपान और स्वास्थ्य
जंक फूड और पैक्ड स्नैक्स ने बच्चों की थाली से पौष्टिकता छीन ली है। कहीं कुपोषण तो कहीं मोटापे की समस्या बढ़ रही है। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि संतुलित आहार बच्चों की स्मरण शक्ति, ध्यान और व्यवहार सुधारता है। इसलिए घर और स्कूल मिलकर बच्चों में स्वस्थ भोजन की आदत डालें।
करियर की नई सोच
पहले करियर का मतलब डॉक्टर, इंजीनियर या सरकारी नौकरी होता था। आज बच्चे डिजिटल मीडिया, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजाइन, उद्यमिता, खेल और रिसर्च जैसे क्षेत्रों में करियर बनाना चाहते हैं। लेकिन कई अभिभावक अब भी पारंपरिक सोच पर अटके हुए हैं। आज के युग में करियर केवल रोज़गार नहीं, बल्कि जीवन जीने का तरीका है।
पैरेंटिंग की नई चुनौतियाँ
आज बच्चों और अभिभावकों के सामने 5 बड़ी चुनौतियाँ हैं –
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तकनीकी लत (Addiction) – मोबाइल और इंटरनेट पर अत्यधिक समय।
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मानसिक स्वास्थ्य – तनाव, अवसाद और आत्मविश्वास की कमी।
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खानपान की गड़बड़ी – जंक फूड और पोषण की कमी।
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मूल्यों का ह्रास – धैर्य और अनुशासन की कमी।
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करियर असमंजस – बच्चों की रुचि और माता-पिता की अपेक्षाओं में टकराव।
समाधान: मिलकर बदलें तस्वीर
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अभिभावक – बच्चों को समय दें, उनकी भावनाएँ सुनें, पोषण व दिनचर्या पर ध्यान दें और करियर में उनकी रुचि का सम्मान करें।
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शिक्षक – शिक्षा के साथ जीवन कौशल व मूल्य शिक्षा पर बल दें। हेल्दी फूड कैंपेन और करियर गाइडेंस प्रोग्राम चलाएँ।
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बच्चे – आत्म-अनुशासन और आत्म-चिंतन की आदत डालें। पौष्टिक आहार अपनाएँ और करियर व जीवन में संतुलन रखें।
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समाज – बच्चों पर अनावश्यक दबाव डालने की बजाय उन्हें प्रोत्साहन दें। सामूहिक खेल और गतिविधियों से सामाजिक मूल्य सिखाएँ।


