धर्म की विजय का प्रतीक: श्रीकृष्ण जन्म कथा

सलोनी तिवारी: श्रीकृष्ण जन्म कथा केवल एक धार्मिक प्रसंग नहीं, बल्कि धर्म और सत्य की अधर्म पर विजय का अमर संदेश है। पुराणों के अनुसार, द्वापर युग में मथुरा के अत्याचारी राजा कंस को आकाशवाणी के माध्यम से चेतावनी मिली कि उसकी बहन देवकी की आठवीं संतान ही उसका अंत करेगी। भयभीत कंस ने देवकी और उनके पति वासुदेव को कैद कर लिया और जन्म लेने वाली पहली छह संतानों की निर्दयता से हत्या कर दी।

सातवीं संतान बलराम को योगमाया के प्रभाव से सुरक्षित रूप से रोहिणी के गर्भ में पहुँचा दिया गया, जबकि आठवीं संतान के रूप में स्वयं भगवान विष्णु ने कृष्ण रूप में अवतार लिया। जन्म की रात आधी रात का समय था—अंधेरी रात में मथुरा की जेल अचानक दिव्य प्रकाश से जगमगा उठी। भगवान ने देवकी-वासुदेव को आदेश दिया कि वे उन्हें गोकुल में नंद-यशोदा के पास पहुँचा दें।

चमत्कार यह था कि जेल के ताले स्वयं खुल गए, पहरेदार गहरी नींद में सो गए और वासुदेव टोकरी में बालक कृष्ण को लेकर यमुना पार करने लगे। तेज़ बहाव के बीच शेषनाग ने फन फैलाकर उनकी रक्षा की। गोकुल में यशोदा की नवजात कन्या से अदला-बदली कर वासुदेव मथुरा लौट आए।

जब कंस ने उस कन्या को मारना चाहा, वह आकाश में उड़ गई और बोली—”तेरा काल जन्म ले चुका है और सुरक्षित है।”
गोकुल में कृष्ण का पालन-पोषण हुआ और उन्होंने बाल्यकाल से ही राक्षसों का वध कर लोककल्याण के कार्य शुरू कर दिए। बड़े होकर उन्होंने कंस का अंत कर धर्म की पुनः स्थापना की।

श्रीकृष्ण जन्म कथा आज भी इस संदेश को दोहराती है कि चाहे अत्याचार कितना भी बड़ा क्यों न हो, सत्य और धर्म अंत में जीतते ही हैं।


धर्म की पुनः स्थापना
गोकुल में श्रीकृष्ण का बचपन बृजवासियों के प्रेम और बाललीलाओं में बीता। उन्होंने पूतना, त्रिनावर्त और अघासुर जैसे राक्षसों का वध किया। युवावस्था में मथुरा लौटकर कंस का वध किया और धर्म की पुनः स्थापना की।


आज का संदेश
श्रीकृष्ण जन्म कथा केवल एक धार्मिक कहानी नहीं, बल्कि यह संदेश देती है कि चाहे अत्याचार कितना भी बड़ा क्यों न हो, अंततः सत्य और धर्म की ही विजय होती है।


NOTE- ये पोस्ट धार्मिक मान्यताओं पर आधिरित है ये किसी भी दावे अथवा घटना की पुष्टि नहीं करता है।

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