आवारा कुत्तों का संकट: ओडिशा में दौलत, हरियाणा-राजस्थान में भी उच्च संख्या – स्वास्थ्य और सुरक्षा को खतरा

सलोनी तिवारी: भारत में आवारा कुत्तों की समस्या गंभीर रूप लेती जा रही है, जो ना केवल स्वास्थ्य और सुरक्षा को प्रभावित कर रही है, बल्कि नगर नियोजन और सामाजिक स्थिरता के लिए भी चुनौतियाँ ला रही है।

सबसे चिंतनीय आंकड़ा ओडिशा का है, जहाँ प्रति 1,000 लोगों पर लगभग 39.7 आवारा कुत्ते पाए जाते हैं — यह देश में सबसे उच्च घनत्व है। इसके बाद जम्मू-कश्मीर (22.9), कर्नाटक (17.3), राजस्थान (16.5), हरियाणा (16.2), और सिक्किम (16.1) का स्थान है। इनमें सबसे कम संख्या वाले राज्य के तौर पर मणिपुर उल्लेखनीय है, जहाँ लगभग 0 आवारा कुत्ते प्रति 1,000 लोगों पर पाए गए।

जन स्वास्थ्य के नजरिए से, कुत्तों द्वारा काटे जाने की घटनाओं की संख्या चिंताजनक है — वर्षभर में लगभग 3.7 लाख मामले, अर्थात् हर दिन 10,000 घटनाएँ, जो घरेलू और शहरी सुरक्षा के लिहाज से गंभीर समस्या बनती जा रही है।

लेकिन एक दिलासा देने वाला पहलू यह है कि भारत में मानव और आवारा कुत्तों के बीच 82 % मुठभेड़ें शांतिपूर्ण होती हैं — यह दर्शाता है कि समस्या को बेहतर शिक्षा, जागरूकता और उन्नत नीति के माध्यम से नियंत्रित किया जा सकता है।


भारत के कुछ राज्यों में प्रति 1,000 लोगों पर आवारा कुत्तों की संख्या के संदर्भ में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त कर सकते हैं — विशेष रूप से ओडिशा, जम्मू-कश्मीर और अन्य राज्यों के आंकड़े स्पष्ट रूप से दिख रहे हैं।


स्थिति का विस्तृत विवरण — आवारा कुत्तों की संख्या (प्रति 1,000 लोग)

  • ओडिशा — सबसे अधिक आवारा कुत्ते: 39.7 प्रति 1,000 व्यक्ति।

  • जम्मू-कश्मीर — दूसरे स्थान पर: 22.9 प्रति 1,000 व्यक्ति।

  • कर्नाटक — लगभग 17.3 प्रति 1,000 व्यक्ति।

  • राजस्थान16.5 प्रति 1,000 व्यक्ति।

  • हरियाणा16.2 प्रति 1,000 व्यक्ति।

  • सिक्किम16.1 प्रति 1,000 व्यक्ति।

  • मानपुरी, रिपोर्ट के अनुसार, सबसे कम — लगभग 0 प्रति 1,000 व्यक्ति।

समेकित रणनीतिक दिशा:

  • आवारा कुत्तों के टीकाकरण और उदाहरण–नियंत्रण (ABC) कार्यक्रम लागू होने चाहिए।

  • शहरी और ग्रामीण प्रशासन को इस दिशा में संगठित प्रयास शुरू करना चाहिए, जिसमें पेट ट्रैकर, फीडिंग जोन, नसबंदी शिविर, और जन शिक्षण अभियान शामिल हो सकते हैं।

  • राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर डीरेबल, मानव केंद्रित समाधान — जैसे कि पशु कल्याण बोर्ड के कानूनों (PCA 1960) का कड़ाई से पालन — जरूरी है।

इस आकृति को सोशल मीडिया और समाचार प्लेटफॉर्म पर साझा करने से आम जनता में भी जागरूकता बढ़ेगी और नीति निर्माताओं तक इस समस्या की गंभीरता का संदेश पहुंच सकता है।

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