नई दिल्ली। भारत सरकार ने मणिपुर में राष्ट्रपति शासन को एक और छह महीने के लिए आगे बढ़ाने का निर्णय लिया है। यह आदेश 13 अगस्त 2025 से प्रभावी होगा और फरवरी 2026 तक जारी रहेगा। इस निर्णय को both Houses of Parliament की मंजूरी मिली है।
विस्तार के अहम तथ्य
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संसद में पारित प्रस्ताव में कहा गया कि मणिपुर में हाल की अशांति, कानून-व्यवस्था की स्थिति, और संवैधानिक तंत्र की विफलता को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया गया।
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राष्ट्रपति शासन का विस्तार पार्लियामेंटरी प्रक्रिया के तहत हुआ — पहले लोकसभा और फिर राज्यसभा से — इसे एक “संवैधानिक दायित्व” बताया गया।
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यह कदम अनुच्छेद 356 के तहत उठाया गया, जो तब लागू होता है जब किसी राज्य की सरकार संवैधानिक रूप से कार्य नहीं कर पा रही हो।
पृष्ठभूमि और प्रशासनिक स्थिति
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फरवरी 2025 में मुख्यमंत्री के इस्तीफे और राज्य में उठे जातीय-राजनीतिक संकट के कारण राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था।
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राज्य में मेइतेई और कुकि-ज़ो समुदायों के बीच हिंसा के कारण अब तक सैकड़ों लोग मारे गए और लगभग 60,000 लोग विस्थापित हुए।
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राष्ट्रपति शासन लागू होने के बाद राज्य में हिंसा की घटनाएँ तुलना में कम हुईं, और प्रशासनिक ढांचा केंद्र सरकार के नियंत्रण में लाया गया।
राजनीतिक प्रतिक्रिया और चुनौतियाँ
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मणिपुर के कांग्रेस अध्यक्ष ने इस विस्तार की कड़ी आलोचना करते हुए इसे लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ बताया। उन्होंने इसे राज्यवासियों की इच्छा के विपरीत और प्रशासनिक विफलता की परिणति बताया।
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विपक्षी राजनीतिक दलों ने लोकतंत्र, जनप्रतिनिधित्व, और संविधान की मूल भावना की रक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया।
वर्तमान में स्थिति और आगे का रास्ता
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यह राष्ट्रपति शासन फरवरी 2026 तक जारी रहेगा, जब तक राज्य में सामान्य प्रशासनिक प्रक्रिया बहाल नहीं हो जाती।
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सरकार का दावा है कि इस अवधि में शांति बहाल करने, विस्थापितों के पुनर्वास के कार्यों, और पुन: चुनाव की स्थिति पैदा करने पर ध्यान दिया जाएगा।
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विशेषज्ञों की राय है कि अगर आने वाले महीनों में स्थिति सामान्य हुई, तो विधानसभा चुनाव की संभावना बढ़ सकती है।

