हिंदू धर्म में भगवान शिव को त्रिदेवों (ब्रह्मा, विष्णु और महेश) में ‘संहारकर्ता’ माना गया है। शिवजी के अनेक रूपों में ‘लिंग रूप’ को अत्यंत पवित्र और पूजनीय माना जाता है। ‘ज्योतिर्लिंग’ शब्द दो शब्दों से मिलकर बना है – ‘ज्योति’ अर्थात् प्रकाश और ‘लिंग’ अर्थात् सृष्टि का प्रतीक रूप। इस प्रकार, ज्योतिर्लिंग का अर्थ होता है प्रकाश का वह दिव्य स्तंभ जिसमें शिवजी स्वयं प्रकट होते हैं।
यह कथा शिव पुराण और लिंग पुराण में वर्णित है— एक बार ब्रह्मा जी और विष्णु जी में यह विवाद उत्पन्न हुआ कि कौन श्रेष्ठ है। दोनों में तर्क बढ़ा तो भगवान शिव प्रकट हुए और उन्होंने एक विशाल, अग्निमय लिंग (प्रकाशस्तंभ) के रूप में आकाश से पाताल तक अपनी ज्योति फैलाई।
शिवजी ने कहा –
“तुम दोनों इस लिंग के छोर को ढूंढो। जो इसका सिर या पैर खोज लेगा, वही श्रेष्ठ होगा।”
विष्णु जी पाताल की ओर और ब्रह्मा जी ऊपर की ओर चले। विष्णु हार मान गए लेकिन ब्रह्मा जी ने झूठ बोल दिया कि उन्होंने लिंग का सिर देख लिया है। इस पर शिवजी प्रकट हुए और ब्रह्मा जी को झूठ बोलने के लिए शाप दिया कि उन्हें कभी पूजा नहीं जाएगा
ज्योतिर्लिंग की संख्या 12 क्यों है?
शिवपुराण और अन्य ग्रंथों में 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख मिलता है। ये सभी स्थान भगवान शिव के आकाश-ज्योति स्वरूप के विशेष प्रकट रूप माने जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि इन 12 स्थानों पर भगवान शिव ने स्वयं को ज्योति के रूप में प्रकट किया या उनकी विशेष कृपा प्रकट हुई।
🕉️ 12 ज्योतिर्लिंगों के नाम और स्थान:
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सोमनाथ (गुजरात)
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मल्लिकार्जुन (आंध्र प्रदेश)
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महाकालेश्वर (उज्जैन, मध्य प्रदेश)
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ओंकारेश्वर (मध्य प्रदेश)
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केदारनाथ (उत्तराखंड)
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भीमाशंकर (महाराष्ट्र)
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काशी विश्वनाथ (वाराणसी, उत्तर प्रदेश)
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त्र्यम्बकेश्वर (नासिक, महाराष्ट्र)
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वैद्यनाथ (झारखंड)
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नागेश्वर (गुजरात)
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रामेश्वरम (तमिलनाडु)
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घृष्णेश्वर (महाराष्ट्र)
Disclaimer: ये पोस्ट धार्मिक मान्यताओं पर आधिरित है ये किसी भी दावे अथवा घटना की पुष्टि नहीं करता है।

