सलोनी तिवारी: ऋषीवाणी : सनातन धर्म की परंपराओं में देवशयनी एकादशी को अत्यंत शुभ और पुण्यदायी तिथि माना गया है। पद्म पुराण के अनुसार, आषाढ़ शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को भगवान विष्णु योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं और चार महीनों तक विश्राम की अवस्था में रहते हैं। इस अवधि को चातुर्मास कहा जाता है, जो संयम, साधना और संयोजित जीवन का प्रतीक है।
मान्यता है कि देवशयनी एकादशी पर भगवान श्रीहरि विष्णु की विधिपूर्वक पूजा और व्रत करने से साधक को तीनों लोकों और त्रिदेवों की आराधना के समान पुण्य प्राप्त होता है। यह दिन केवल आध्यात्मिक उपासना का नहीं, बल्कि जीवन के संतुलन और अनुशासन की भी प्रेरणा देता है। धर्म को देश, काल और परिस्थिति के अनुसार आचरण में लाने की जो परंपरा है, उसका एक उत्कृष्ट उदाहरण देवशयनी एकादशी है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एकादशी तिथि स्वयं भगवान विष्णु से प्रकट देवी का स्वरूप है, जिन्होंने मुर नामक राक्षस का वध कर धर्म की स्थापना की थी। देवशयनी एकादशी से लेकर कार्तिक शुक्ल एकादशी तक चार महीनों का समय चातुर्मास कहलाता है। इस दौरान साधक नियमपूर्वक जीवन यापन करते हैं, संयम रखते हैं और व्रत का पालन करते हैं।
चातुर्मास में विशेष आहार नियमों का पालन भी किया जाता है। श्रावण मास में शाक, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध और कार्तिक में दाल का त्याग किया जाता है। माना जाता है कि यह नियम स्वास्थ्य के साथ-साथ आत्मिक शुद्धि में भी सहायक होता है। इस दौरान विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञोपवित जैसे शुभ कार्य नहीं किए जाते क्योंकि यह समय साधना और आत्मनियंत्रण के लिए निर्धारित है।
चातुर्मास की शुरुआत का यह पर्व न केवल आस्था, भक्ति और तप का प्रतीक है, बल्कि आत्मसंयम, आहार संयम और मन की स्थिरता का भी मार्गदर्शक है। देवशयनी एकादशी से आरंभ यह अध्यात्मिक यात्रा प्रत्येक व्यक्ति को जीवन की मूल चेतना के निकट ले जाती है।
अस्वीकरण- यहां दी गई जानकारियां धार्मिक आस्था और लोक मान्यताओं पर आधारित हैं। आंशिक मीडिआ किसी बात की सत्यता का प्रमाण नहीं देता है।

