बहुत समय पहले की बात है। एक दिन भगवान गणेश जी ने एक अनोखी लीला करने का विचार किया। वे अपने हाथ में एक चम्मच दूध और एक मुट्ठी चावल लेकर घर-घर जाने लगे।
गणेश जी हर किसी से कहते—
“क्या कोई मेरे लिए इन चावलों और दूध से खीर बना देगा?”
सबसे पहले वे एक घर के दरवाजे पर पहुंचे और बोले,
“मां, क्या आप मेरे लिए खीर बना देंगी?”
घर की महिला ने देखा कि गणेश जी के हाथ में बस एक चम्मच दूध और एक मुट्ठी चावल हैं। वह हंसते हुए बोली,
“इतने से दूध और चावल से भला कितनी खीर बनेगी? जाओ बेटा, किसी और से कहो।”
गणेश जी मुस्कुराए और आगे बढ़ गए।
वे दूसरे घर पहुंचे। वहां भी उन्होंने वही बात कही। किसी ने उनकी बात को गंभीरता से नहीं लिया। किसी ने कहा कि इतना सामान बहुत कम है, तो किसी ने कहा कि खीर बनाने के लिए दूध और चावल दोनों अधिक चाहिए।
गणेश जी लगातार घर-घर जाते रहे, लेकिन कोई भी उनकी छोटी-सी मांग पूरी करने को तैयार नहीं हुआ।
आखिरकार वे एक गरीब वृद्ध महिला के घर पहुंचे। वृद्धा बहुत साधारण जीवन जीती थी। गणेश जी ने उससे भी वही कहा—
“मां, क्या आप मेरे लिए इन चावलों और दूध से खीर बना देंगी?”
वृद्धा ने गणेश जी को ध्यान से देखा और बोली—
“बेटा, मेरे पास ज्यादा कुछ तो नहीं है, लेकिन अगर तुम्हारी इच्छा है तो मैं जरूर तुम्हारे लिए खीर बनाऊंगी।”
वृद्धा ने श्रद्धा से उन चावलों और दूध को एक बर्तन में डाल दिया और खीर बनाने लगी।
लेकिन जैसे ही वह खीर बनाने लगी, गणेश जी की लीला शुरू हो गई।
वह थोड़े से दूध और चावल बढ़ते-बढ़ते इतने हो गए कि पूरा बर्तन भर गया। फिर भी खीर खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी।
वृद्धा हैरान रह गई।
उसने सबसे पहले गणेश जी को खीर का भोग लगाया और फिर आसपास के लोगों को बुलाकर प्रसाद बांटने लगी। देखते ही देखते खीर इतनी अधिक हो गई कि पूरे गांव के लोग भी उसे खाकर तृप्त हो गए।
तब वृद्धा को समझ आया कि जिस बालक को उसने अपने घर पर खीर खिलाई, वह कोई साधारण बालक नहीं था, बल्कि स्वयं भगवान गणेश जी थे।
गणेश जी वृद्धा की श्रद्धा और प्रेम से प्रसन्न हुए। उन्होंने उसे आशीर्वाद दिया—
“जिस घर में श्रद्धा, विश्वास और अतिथि के प्रति प्रेम होगा, वहां कभी सुख-समृद्धि की कमी नहीं होगी।”
कहते हैं कि उस दिन के बाद वृद्धा के घर में सुख-समृद्धि आने लगी और उसका जीवन खुशियों से भर गया।
