उज्जैन। भगवान महाकाल की नगरी उज्जैन अपने प्राचीन मंदिरों, धार्मिक परंपराओं और रहस्यमयी मान्यताओं के लिए पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। इन्हीं में से एक है महाकालेश्वर मंदिर परिसर की तीसरी मंजिल पर स्थित श्री नागचंद्रेश्वर मंदिर, जिसके कपाट साल में केवल एक बार नाग पंचमी के दिन श्रद्धालुओं के लिए खोले जाते हैं। यही विशेषता इस मंदिर को देश के सबसे अनोखे धार्मिक स्थलों में शामिल करती है।
नाग पंचमी पर ही क्यों खुलते हैं कपाट?
नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट वर्षभर बंद रहते हैं और नाग पंचमी के अवसर पर ही दर्शन के लिए खोले जाते हैं। परंपरा के अनुसार नाग पंचमी की मध्यरात्रि मंदिर के कपाट खुलते हैं और लगभग 24 घंटे तक श्रद्धालु भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन कर सकते हैं। इसके बाद मंदिर के कपाट पुनः बंद कर दिए जाते हैं।
महाकालेश्वर मंदिर की आधिकारिक जानकारी के अनुसार भी नागचंद्रेश्वर मंदिर केवल नाग पंचमी के अवसर पर ही खोला जाता है।
क्या है नागचंद्रेश्वर मंदिर की पौराणिक कथा?
पौराणिक मान्यता के अनुसार नागराज तक्षक ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की थी। उनकी घोर तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अमरत्व का वरदान दिया।
वरदान प्राप्त करने के बाद तक्षक नाग भगवान शिव की शरण में रहने लगे। मान्यता है कि उन्होंने महाकाल वन अर्थात वर्तमान उज्जैन में भगवान शिव के सानिध्य में निवास करना स्वीकार किया। तक्षक नाग की इच्छा थी कि उनकी साधना और एकांत में कोई बाधा न आए।
इसी मान्यता से यह परंपरा जुड़ी मानी जाती है कि नागराज तक्षक के एकांत और तपस्या का सम्मान करते हुए नागचंद्रेश्वर मंदिर के कपाट पूरे वर्ष बंद रखे जाते हैं और केवल नाग पंचमी के दिन ही श्रद्धालुओं को भगवान के दर्शन का अवसर मिलता है।
शिव-पार्वती नाग की शैय्या पर विराजमान
नागचंद्रेश्वर मंदिर की सबसे अद्भुत विशेषता यहां स्थापित प्राचीन प्रतिमा है। इसमें भगवान शिव और माता पार्वती को नाग के फनों के नीचे विराजमान दिखाया गया है।
आम तौर पर शेषनाग की शैय्या पर भगवान विष्णु के विराजमान होने का स्वरूप प्रसिद्ध है, लेकिन यहां भगवान शिव और माता पार्वती का नाग के ऊपर विराजमान स्वरूप दिखाई देता है। इसी कारण इस प्रतिमा को अत्यंत दुर्लभ और विशिष्ट माना जाता है। विभिन्न स्रोत इस प्रतिमा को 11वीं शताब्दी से जोड़ते हैं।
कुछ प्रचलित मान्यताओं में यह भी कहा जाता है कि यह प्रतिमा नेपाल से उज्जैन लाई गई थी। हालांकि इस संबंध में उपलब्ध विवरण मुख्यतः धार्मिक परंपराओं और स्थानीय मान्यताओं पर आधारित हैं।
नाग पंचमी पर लगता है भक्तों का सैलाब
नाग पंचमी के दिन मंदिर के कपाट खुलने का इंतजार श्रद्धालु पूरे वर्ष करते हैं। कपाट खुलते ही भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए लंबी कतारें लग जाती हैं और देशभर से श्रद्धालु उज्जैन पहुंचते हैं।
श्रद्धालुओं की आस्था है कि नाग पंचमी के दिन नागचंद्रेश्वर के दर्शन करने और भगवान शिव की आराधना करने से नाग देवता तथा भगवान महादेव की कृपा प्राप्त होती है। कुछ धार्मिक मान्यताओं में नागदोष या सर्पदोष से मुक्ति की कामना से भी यहां दर्शन-पूजन करने की परंपरा बताई गई है। इसे धार्मिक आस्था की मान्यता के रूप में समझना चाहिए, न कि चिकित्सकीय या वैज्ञानिक दावा।
त्रिकाल पूजा की विशेष परंपरा
नाग पंचमी के अवसर पर नागचंद्रेश्वर भगवान की विशेष पूजा-अर्चना की जाती है। इस अवसर पर होने वाली पूजा को लेकर उज्जैन में विशेष धार्मिक परंपराएं चली आ रही हैं। नाग पंचमी पर होने वाली त्रिकाल पूजा भी इस मंदिर की विशिष्ट परंपराओं में गिनी जाती है।
11वीं शताब्दी से जुड़ा है इतिहास
नागचंद्रेश्वर मंदिर और यहां स्थापित प्रतिमा को लेकर इतिहास और धार्मिक परंपराओं में अलग-अलग विवरण मिलते हैं। कई स्रोत मंदिर अथवा प्रतिमा को 11वीं शताब्दी से जोड़ते हैं और इसके निर्माण को परमार काल से संबंधित बताते हैं। बाद में महाकाल मंदिर परिसर में समय-समय पर जीर्णोद्धार भी हुआ।
इस मंदिर की पूजा और व्यवस्था की परंपरा का संबंध पंचायती अखाड़ा महानिर्वाणी से भी रहा है। महाकालेश्वर मंदिर की आधिकारिक वेबसाइट नागचंद्रेश्वर मंदिर को अखाड़े से संबद्ध परंपराओं में शामिल करती है।
नाग पंचमी और भगवान शिव का संबंध
सनातन परंपरा में नागों का भगवान शिव से गहरा संबंध माना जाता है। भगवान शिव के गले में विराजमान नाग वैराग्य, निर्भयता और प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व के प्रतीक के रूप में भी देखे जाते हैं।
नाग पंचमी इसी नाग-पूजा की प्राचीन परंपरा को आगे बढ़ाने वाला पर्व है। इसलिए उज्जैन के नागचंद्रेश्वर मंदिर में नाग पंचमी का महत्व और भी विशेष माना जाता है—एक ओर ज्योतिर्लिंग महाकाल की नगरी, दूसरी ओर नागराज तक्षक से जुड़ी पौराणिक मान्यता और तीसरी ओर शिव-पार्वती का नाग के फनों पर विराजमान दुर्लभ स्वरूप।
रहस्य, आस्था और परंपरा का अनोखा संगम
नागचंद्रेश्वर मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यही है कि जहां देशभर के अधिकांश मंदिर वर्षभर श्रद्धालुओं के लिए खुले रहते हैं, वहीं महाकाल परिसर का यह मंदिर केवल नाग पंचमी पर दर्शन देता है।
सालभर बंद रहने और एक विशेष पर्व पर ही कपाट खुलने की यह परंपरा श्रद्धालुओं के बीच गहरी आस्था और जिज्ञासा पैदा करती है। नाग पंचमी के दिन यहां दर्शन करना भक्तों के लिए अत्यंत दुर्लभ और सौभाग्यशाली अवसर माना जाता है।
उज्जैन का नागचंद्रेश्वर मंदिर इसलिए केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि भगवान शिव, नागराज तक्षक, तपस्या, आस्था और सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा का अद्भुत संगम है।