कानपुर में गर्मी की छुट्टियों के बाद एक बार फिर स्कूलों की घंटियां बजने लगी हैं। शहर के हजारों बच्चे रोजाना स्कूल पहुंच रहे हैं। अभिभावकों के चेहरे पर जहां बच्चों के भविष्य को लेकर उम्मीद दिखाई देती है, वहीं एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो रहा है—क्या कानपुर के स्कूल फायर सेफ्टी के लिहाज से पूरी तरह सुरक्षित हैं?
देश के कई राज्यों में स्कूलों, कोचिंग संस्थानों और अस्पतालों में आग लगने की घटनाओं ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। ऐसे में कानपुर जैसे बड़े शहर में संचालित सरकारी और निजी स्कूलों की सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा बेहद जरूरी हो जाती है। स्कूलों में बच्चों की संख्या अधिक होती है और अधिकांश बच्चे छोटे होते हैं, जिन्हें आपात स्थिति में खुद को सुरक्षित निकालना आसान नहीं होता। इसलिए फायर सेफ्टी केवल औपचारिकता नहीं बल्कि बच्चों की जिंदगी से जुड़ा बेहद संवेदनशील विषय है।
फायर एनओसी और सुरक्षा मानकों का सवाल
फायर विभाग के नियमों के अनुसार बड़े स्कूलों में फायर एनओसी (No Objection Certificate) होना अनिवार्य है। इसके साथ ही भवन में फायर एक्सटिंग्विशर, इमरजेंसी एग्जिट, फायर अलार्म, पानी की पर्याप्त व्यवस्था और आपातकालीन निकासी योजना होनी चाहिए। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि शहर में कई छोटे और मध्यम स्तर के स्कूल अभी भी इन मानकों को पूरी तरह पूरा नहीं कर पा रहे हैं।
कुछ स्कूलों में अग्निशमन यंत्र तो लगे हुए दिखाई देते हैं, लेकिन वे या तो एक्सपायर हो चुके होते हैं या स्टाफ को उन्हें इस्तेमाल करना नहीं आता। कई जगहों पर इमरजेंसी एग्जिट के रास्तों पर सामान रखा मिलता है। वहीं कई स्कूल तंग गलियों या भीड़भाड़ वाले इलाकों में संचालित हो रहे हैं, जहां फायर ब्रिगेड की गाड़ियां समय पर पहुंचने में कठिनाई महसूस कर सकती हैं।
बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा बड़ा खतरा
विशेषज्ञों के अनुसार स्कूलों में सबसे बड़ा खतरा शॉर्ट सर्किट, ओवरलोडेड वायरिंग और लैब या कैंटीन क्षेत्रों से होता है। बरसात के मौसम में बिजली संबंधी हादसों की संभावना और बढ़ जाती है। यदि किसी भवन में वायरिंग पुरानी है और समय-समय पर उसकी जांच नहीं होती, तो आग लगने का खतरा लगातार बना रहता है। स्कूलों में छोटे बच्चों की मौजूदगी स्थिति को और गंभीर बना देती है। आग लगने पर भगदड़ मच सकती है और बच्चे घबराहट में सही रास्ता नहीं समझ पाते। ऐसे मामलों में स्कूल प्रशासन की तत्परता और पूर्व तैयारी ही बड़ा फर्क पैदा करती है।
क्या स्कूलों में हो रही है मॉक ड्रिल?
फायर सेफ्टी विशेषज्ञों का मानना है कि केवल उपकरण लगा देना पर्याप्त नहीं है। सबसे जरूरी है नियमित मॉक ड्रिल और प्रशिक्षण। कई बड़े स्कूल समय-समय पर फायर ड्रिल आयोजित करते हैं, जिनमें बच्चों और शिक्षकों को आपात स्थिति में बाहर निकलने का अभ्यास कराया जाता है। लेकिन अधिकांश स्कूलों में यह व्यवस्था नियमित रूप से नहीं हो पाती।
यदि बच्चों को पहले से यह जानकारी हो कि आग लगने पर क्या करना है, किस दिशा में निकलना है और घबराना नहीं है, तो बड़े हादसे को टाला जा सकता है। शिक्षकों और स्टाफ को भी प्राथमिक अग्निशमन उपकरण चलाने का प्रशिक्षण होना चाहिए।
प्रशासन और फायर विभाग की जिम्मेदारी
फायर विभाग समय-समय पर संस्थानों का निरीक्षण करता है, लेकिन शहर में स्कूलों की बड़ी संख्या को देखते हुए नियमित निगरानी एक चुनौती बनी हुई है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल कागजी एनओसी जारी करना काफी नहीं है, बल्कि यह भी सुनिश्चित होना चाहिए कि स्कूल वास्तव में सुरक्षा मानकों का पालन कर रहे हैं या नहीं।
प्रशासन को चाहिए कि स्कूल खुलने के समय विशेष अभियान चलाकर फायर सेफ्टी ऑडिट कराया जाए। जिन स्कूलों में कमियां पाई जाएं, उन्हें नोटिस देकर तत्काल सुधार सुनिश्चित कराया जाए। गंभीर लापरवाही मिलने पर कार्रवाई भी जरूरी है, ताकि बच्चों की सुरक्षा के साथ समझौता न हो।
अभिभावकों को भी रहना होगा सतर्क
फायर सेफ्टी केवल स्कूल प्रशासन या सरकारी विभाग की जिम्मेदारी नहीं है। अभिभावकों को भी यह जानने का अधिकार है कि जिस स्कूल में उनका बच्चा पढ़ रहा है, वहां सुरक्षा व्यवस्था कैसी है। माता-पिता स्कूल प्रबंधन से यह पूछ सकते हैं कि—
- क्या स्कूल के पास वैध फायर एनओसी है?
- फायर एक्सटिंग्विशर कितने और कहां लगे हैं?
- क्या स्कूल में इमरजेंसी एग्जिट मौजूद है?
- आखिरी बार फायर ड्रिल कब हुई थी?
- क्या स्टाफ को आपातकालीन प्रशिक्षण दिया गया है?
यदि अभिभावक जागरूक होंगे, तो स्कूल प्रबंधन भी सुरक्षा मानकों को गंभीरता से लेने के लिए मजबूर होगा।
छोटे स्कूलों में ज्यादा चिंता
कानपुर में कई छोटे निजी स्कूल किराए की इमारतों में संचालित हो रहे हैं। इनमें से कुछ भवन आवासीय उपयोग के लिए बने थे, जिन्हें बाद में स्कूल में बदल दिया गया। ऐसे भवनों में सुरक्षा मानकों का पालन करना अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। कई जगह सीढ़ियां संकरी होती हैं, खिड़कियां कम होती हैं और एक साथ बड़ी संख्या में बच्चों के निकलने की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती।
विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसे स्कूलों की विशेष जांच होनी चाहिए। यदि भवन बच्चों की सुरक्षा के अनुकूल नहीं है, तो वहां स्कूल संचालन पर सख्ती जरूरी है।
तकनीक और जागरूकता से बढ़ सकती है सुरक्षा
आज के समय में कई आधुनिक सुरक्षा उपकरण उपलब्ध हैं, जैसे स्मोक डिटेक्टर, ऑटोमैटिक फायर अलार्म और स्प्रिंकलर सिस्टम। बड़े स्कूलों में इन तकनीकों का इस्तेमाल बढ़ रहा है, लेकिन छोटे संस्थानों में अभी यह आम नहीं हो पाया है। सरकार यदि स्कूलों को सुरक्षा उपकरण लगाने के लिए प्रोत्साहन दे, तो स्थिति बेहतर हो सकती है।
इसके साथ ही बच्चों को शुरुआती स्तर से ही फायर सेफ्टी के बारे में शिक्षित करना भी जरूरी है। यदि स्कूलों में समय-समय पर जागरूकता कार्यक्रम आयोजित हों, तो बच्चे आपात स्थिति में अधिक सतर्क और सुरक्षित रह सकते हैं।
सुरक्षा में लापरवाही नहीं होनी चाहिए
कानपुर में स्कूल खुल चुके हैं और रोजाना लाखों बच्चे शिक्षा के लिए घर से निकल रहे हैं। ऐसे में यह सुनिश्चित करना बेहद जरूरी है कि स्कूल केवल पढ़ाई का केंद्र न हों, बल्कि सुरक्षा के लिहाज से भी पूरी तरह तैयार हों। फायर सेफ्टी कोई अतिरिक्त सुविधा नहीं बल्कि बुनियादी आवश्यकता है।
एक छोटी सी लापरवाही बड़े हादसे का कारण बन सकती है। इसलिए स्कूल प्रबंधन, प्रशासन, फायर विभाग और अभिभावकों—सभी को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि बच्चों का भविष्य सुरक्षित हाथों में हो। क्योंकि शिक्षा तभी सार्थक है, जब स्कूल परिसर बच्चों के लिए पूरी तरह सुरक्षित हो।
अगर आपके आस पास या आपकी जानकारी में ऐसे स्कूल संचालित हो रहे हैं जो नियमों का पालन नहीं कर रहे हैं तो AMD न्यूज़ के हेल्प डेस्क नंबर 8707805733 पर इसकी सूचना जनहित में जरूर दें

