उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में हुए दर्दनाक अग्निकांड ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। इस घटना के बाद प्रशासन हरकत में आया है और प्रदेश के विभिन्न जिलों में कोचिंग सेंटरों की सघन जांच शुरू कर दी गई है। फायर विभाग, विकास प्राधिकरण और जिला प्रशासन संयुक्त रूप से कोचिंग संस्थानों में सुरक्षा मानकों का निरीक्षण कर रहे हैं। जहां-जहां कमियां मिल रही हैं, वहां नोटिस जारी किए जा रहे हैं और आवश्यक कार्रवाई भी की जा रही है।
यह कदम निश्चित रूप से स्वागतयोग्य है, लेकिन इस पूरे अभियान के बीच एक महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता है—क्या आग लगने का खतरा केवल कोचिंग सेंटरों तक ही सीमित है? क्या प्रदेश के हजारों निजी अस्पताल, नर्सिंग होम और स्वास्थ्य संस्थान पूरी तरह सुरक्षित हैं? यदि नहीं, तो फिर उनके लिए व्यापक जांच अभियान कब शुरू होगा?
अस्पतालों की सुरक्षा पर उठ रहे सवाल
उत्तर प्रदेश के लगभग हर शहर और कस्बे में बड़ी संख्या में निजी अस्पताल और नर्सिंग होम संचालित हो रहे हैं। इनमें से कई अस्पताल आवासीय भवनों में चल रहे हैं, जबकि कुछ संकरी गलियों और भीड़भाड़ वाले इलाकों में स्थित हैं। ऐसे स्थानों पर यदि कोई बड़ी आग लग जाए तो राहत और बचाव कार्य बेहद चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
अस्पतालों में सामान्य इमारतों की तुलना में आग लगने का जोखिम अधिक होता है क्योंकि वहां ऑक्सीजन सिलेंडर, विद्युत उपकरण, जनरेटर और विभिन्न प्रकार के ज्वलनशील पदार्थ मौजूद रहते हैं। यदि सुरक्षा मानकों की अनदेखी की जाए तो एक छोटी सी चिंगारी भी बड़े हादसे का रूप ले सकती है।
मरीजों की जान पर सबसे बड़ा खतरा
कोचिंग सेंटर में मौजूद छात्र किसी आपात स्थिति में भागकर बाहर निकल सकते हैं, लेकिन अस्पतालों में भर्ती मरीजों के साथ ऐसा संभव नहीं होता। आईसीयू में भर्ती मरीज, ऑपरेशन थिएटर में मौजूद लोग, नवजात शिशु और गंभीर रोगी स्वयं बाहर निकलने में सक्षम नहीं होते।
यही कारण है कि अस्पतालों में फायर सेफ्टी मानकों का पालन अन्य संस्थानों की तुलना में और अधिक सख्ती से होना चाहिए। दुर्भाग्यवश कई स्थानों पर स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है।
क्या केवल कागजों पर पूरी हो रही सुरक्षा?
अक्सर देखने में आता है कि कई संस्थानों के पास फायर एनओसी तो होती है, लेकिन वास्तविक स्थिति में सुरक्षा उपकरण या तो काम नहीं करते या उनका नियमित रखरखाव नहीं किया जाता। कई अस्पतालों में अग्निशमन यंत्र केवल औपचारिकता बनकर रह जाते हैं।
कुछ सामान्य कमियां जो अक्सर देखने को मिलती हैं—
- आपातकालीन निकास मार्ग का अभाव।
- अग्निशमन यंत्रों का अनुपयोगी होना।
- फायर अलार्म सिस्टम का न होना।
- विद्युत तारों का अव्यवस्थित जाल।
- बेसमेंट का अवैध उपयोग।
- पार्किंग और प्रवेश मार्गों पर अतिक्रमण।
यदि ऐसी परिस्थितियों में आग लग जाए तो स्थिति बेहद भयावह हो सकती है।
प्रदेशव्यापी अस्पताल जांच अभियान की जरूरत
लखनऊ अग्निकांड के बाद जिस तरह कोचिंग संस्थानों की जांच की जा रही है, उसी प्रकार प्रदेश के सभी निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम की भी विशेष जांच होनी चाहिए।
जांच के दौरान यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि—
- फायर एनओसी वैध है या नहीं।
- अग्निशमन उपकरण कार्यशील हैं या नहीं।
- आपातकालीन निकास मार्ग उपलब्ध हैं या नहीं।
- भवन का उपयोग स्वीकृत मानकों के अनुसार हो रहा है या नहीं।
- अस्पताल कर्मचारियों को आपदा प्रबंधन का प्रशिक्षण दिया गया है या नहीं।
केवल कार्रवाई नहीं, जवाबदेही भी जरूरी
किसी भी बड़े हादसे के बाद कार्रवाई करना आसान होता है, लेकिन वास्तविक चुनौती ऐसी घटनाओं को होने से पहले रोकने की है। इसके लिए केवल अस्पताल संचालकों ही नहीं बल्कि संबंधित विभागों की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
यदि कोई अस्पताल वर्षों से सुरक्षा मानकों का उल्लंघन कर रहा है तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि निरीक्षण करने वाली एजेंसियों ने समय रहते कार्रवाई क्यों नहीं की।

