लखनऊ कोचिंग सेंटर अग्निकांड ने खोली सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल, क्या कानपुर समेत प्रदेश के कोचिंग संस्थान भी हैं खतरे की जद में?

कानपुर/लखनऊ। राजधानी लखनऊ में एक कोचिंग सेंटर में आग लगने की दर्दनाक घटना ने पूरे प्रदेश को झकझोर कर रख दिया है। प्रारंभिक सूचनाओं के अनुसार इस हादसे में कई छात्रों की जान जाने की आशंका जताई जा रही है, जबकि अनेक छात्र घायल हुए हैं। घटना के बाद एक बार फिर यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या प्रदेश के कोचिंग सेंटरों, निजी शिक्षण संस्थानों और व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों में छात्रों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम मौजूद हैं या नहीं।

यह कोई पहला मामला नहीं है जब किसी शिक्षण संस्थान में आग लगने की घटना सामने आई हो। देश के विभिन्न राज्यों में समय-समय पर स्कूलों, कोचिंग संस्थानों, अस्पतालों और व्यावसायिक प्रतिष्ठानों में आग लगने की घटनाएं होती रही हैं, लेकिन हर हादसे के बाद कुछ दिनों तक चर्चा होने के पश्चात व्यवस्था फिर पुराने ढर्रे पर लौट आती है। नतीजा यह होता है कि अगला हादसा होने तक सुरक्षा नियम केवल कागजों तक सीमित रह जाते हैं।

सुरक्षा से अधिक कमाई पर ध्यान

आज शिक्षा एक बड़े व्यवसाय का रूप ले चुकी है। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कराने वाले कोचिंग संस्थान शहरों में तेजी से बढ़ रहे हैं। सीमित स्थान में अधिक से अधिक छात्रों को बैठाकर पढ़ाने की प्रवृत्ति आम हो चुकी है। कई संस्थान ऐसे भवनों में संचालित हो रहे हैं जो मूल रूप से व्यावसायिक या आवासीय उपयोग के लिए बनाए गए थे, लेकिन बाद में उन्हें कोचिंग सेंटर में बदल दिया गया।

अधिकांश स्थानों पर भवन की क्षमता से कहीं अधिक छात्रों को प्रवेश दे दिया जाता है। संकरे रास्ते, अपर्याप्त निकास द्वार, खराब विद्युत वायरिंग और अग्निशमन उपकरणों की अनुपलब्धता किसी भी आपदा की स्थिति में बड़े खतरे का कारण बन सकती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी भवन में एक साथ सैकड़ों छात्र मौजूद हों और वहां आग लग जाए तो कुछ ही मिनटों में भगदड़ की स्थिति बन सकती है। ऐसे समय में सुरक्षित निकासी की व्यवस्था सबसे महत्वपूर्ण होती है, लेकिन अधिकांश संस्थानों में इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया जाता।

नियमों के अनुसार किसी भी बड़े शिक्षण संस्थान, व्यावसायिक प्रतिष्ठान या सार्वजनिक भवन को फायर सेफ्टी मानकों का पालन करना आवश्यक है। भवन में अग्निशमन यंत्र, फायर अलार्म, आपातकालीन निकास द्वार, आपदा प्रबंधन योजना और नियमित निरीक्षण जैसी व्यवस्थाएं होनी चाहिए।

कानपुर में भी कम नहीं है खतरा

यदि कानपुर नगर की बात करें तो यहां भी बड़ी संख्या में कोचिंग संस्थान संचालित हो रहे हैं। काकादेव, स्वरूप नगर, गोविंद नगर, बर्रा, नौबस्ता और अन्य क्षेत्रों में हजारों छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए कोचिंग सेंटरों में आते हैं।

कई संस्थान बहुमंजिला इमारतों में संचालित हो रहे हैं, जहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में विद्यार्थियों की आवाजाही रहती है। सवाल यह है कि क्या इन सभी संस्थानों में फायर सेफ्टी के मानकों का पूरी तरह पालन किया जा रहा है? क्या सभी भवनों का नियमित निरीक्षण हो रहा है? क्या छात्रों और शिक्षकों को आपदा की स्थिति में सुरक्षित निकासी का प्रशिक्षण दिया गया है?

स्थानीय लोगों का कहना है कि अनेक भवनों में पार्किंग, सीढ़ियों और गलियारों तक में अव्यवस्था देखने को मिलती है। यदि किसी कारणवश आग लग जाए या अन्य आपदा आ जाए तो स्थिति गंभीर हो सकती है।

अभिभावकों की बढ़ती चिंता

लखनऊ की घटना के बाद अभिभावकों में चिंता बढ़ गई है। माता-पिता अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा दिलाने के लिए कोचिंग संस्थानों में भेजते हैं, लेकिन उन्हें यह भरोसा भी चाहिए कि उनके बच्चे सुरक्षित वातावरण में पढ़ाई कर रहे हैं।

अभिभावकों का कहना है कि प्रवेश लेने से पहले कोचिंग संस्थानों की पढ़ाई, परिणाम और फीस की जानकारी तो उपलब्ध होती है, लेकिन सुरक्षा व्यवस्थाओं के बारे में शायद ही कोई जानकारी दी जाती हो। अब समय आ गया है कि अभिभावक भी इस विषय पर सवाल पूछें और सुरक्षा मानकों की जानकारी मांगें।

प्रशासन की जिम्मेदारी

किसी भी हादसे के बाद कार्रवाई करना आसान होता है, लेकिन वास्तविक आवश्यकता हादसे से पहले सतर्कता बरतने की है। जिला प्रशासन, अग्निशमन विभाग, नगर निगम और संबंधित विभागों को संयुक्त रूप से ऐसे संस्थानों का नियमित निरीक्षण करना चाहिए।

जिन संस्थानों में सुरक्षा मानकों का पालन नहीं हो रहा है, उनके खिलाफ कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए। केवल नोटिस जारी करना पर्याप्त नहीं है। छात्रों की सुरक्षा से समझौता करने वाले संस्थानों का संचालन तब तक रोका जाना चाहिए जब तक वे सभी मानकों को पूरा न कर लें।

इसके साथ ही भवन निर्माण स्वीकृति, विद्युत सुरक्षा और फायर सेफ्टी प्रमाणपत्रों की समय-समय पर समीक्षा भी आवश्यक है।

मॉक ड्रिल और जागरूकता की जरूरत

विशेषज्ञों का कहना है कि आग से बचाव के लिए केवल उपकरण पर्याप्त नहीं होते। छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को यह भी पता होना चाहिए कि आपातकालीन स्थिति में क्या करना है।

स्कूलों और कोचिंग संस्थानों में नियमित मॉक ड्रिल आयोजित की जानी चाहिए। छात्रों को अग्निशमन यंत्र के उपयोग, सुरक्षित निकासी मार्ग और आपदा प्रबंधन के बुनियादी नियमों की जानकारी दी जानी चाहिए।

अक्सर देखा गया है कि हादसे के समय लोग घबरा जाते हैं और गलत दिशा में भागने लगते हैं, जिससे जान-माल का नुकसान बढ़ जाता है। उचित प्रशिक्षण से इस जोखिम को काफी हद तक कम किया जा सकता है।

शिक्षा संस्थानों को बनाना होगा सुरक्षित

लखनऊ की घटना केवल एक हादसा नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र के लिए चेतावनी है। यदि अभी भी सुरक्षा मानकों को लेकर गंभीर कदम नहीं उठाए गए तो भविष्य में ऐसे हादसे दोबारा हो सकते हैं।

कोचिंग संस्थानों का उद्देश्य छात्रों का भविष्य संवारना है, लेकिन यदि उन्हीं संस्थानों में छात्रों की जान खतरे में पड़ जाए तो यह समाज और प्रशासन दोनों के लिए चिंता का विषय है। शिक्षा के साथ सुरक्षा को भी सर्वोच्च प्राथमिकता देना आवश्यक है।

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