सलोनी तिवारी: कानपुर। 3 मार्च 2026 को ISKCON कानपुर में श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु का पावन प्राकट्य उत्सव ‘गौर पूर्णिमा’ अत्यंत श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर मंदिर प्रांगण भक्तिमय वातावरण से सराबोर हो उठा और सैकड़ों श्रद्धालुओं ने उत्सव में भाग लेकर आध्यात्मिक आनंद का अनुभव किया।
वैदिक शास्त्रों के अनुसार श्री कृष्ण पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान हैं। श्री कृष्ण ने श्रीमती राधारानी के प्रेम भाव की अनुभूति करने के लिए कलयुग में श्री चैतन्य महाप्रभु के रूप में अवतार लिया। विभिन्न वैदिक ग्रंथों—श्री चैतन्य उपनिषद, मुण्डक उपनिषद, स्कंद पुराण, गरुड़ पुराण एवं श्रीमद्भागवत महापुराण—में श्री चैतन्य महाप्रभु की महिमा का विस्तृत वर्णन प्राप्त होता है।
प्रातःकालीन कार्यक्रम की शुरुआत मंगल आरती एवं दर्शन आरती से हुई, जिसमें सैकड़ों भक्तों ने भाग लेकर भगवान की कृपा प्राप्त की। मंदिर में विराजमान श्री श्री राधा माधव, श्री श्री जानकी वल्लभ लक्ष्मण हनुमान तथा श्री श्री निताई गौर सुंदर का भव्य श्रृंगार पुष्पों एवं दिव्य आभूषणों से किया गया। अलंकृत विग्रहों के दर्शन कर श्रद्धालु मंत्रमुग्ध हो उठे।
मंदिर अध्यक्ष प्रेमहरिनाम प्रभुजी ने प्रातःकालीन प्रवचन में श्री चैतन्य महाप्रभु की लीलाओं और शिक्षाओं का मार्मिक वर्णन किया। उन्होंने बताया कि कलयुग में हरिनाम संकीर्तन ही भगवान श्री कृष्ण को प्राप्त करने का सर्वोत्तम और सरल मार्ग है। श्री चैतन्य महाप्रभु ने संकीर्तन आंदोलन के माध्यम से संपूर्ण विश्व में हरि नाम का प्रचार-प्रसार किया और समस्त जीवों को शुद्ध कृष्ण भक्ति का अमूल्य रत्न प्रदान किया।
उल्लेखनीय है कि लगभग 540 वर्ष पूर्व वर्ष 1486 में बंगाल के मायापुर नवद्वीप धाम में श्री चैतन्य महाप्रभु का प्राकट्य हुआ था। उस समय भी चंद्रग्रहण था और भक्तजन गंगा स्नान करते हुए ‘हरि हरि’ का उच्चारण कर रहे थे। इसी ऐतिहासिक संयोग की पुनरावृत्ति इस वर्ष भी देखने को मिली, जब संध्या काल चंद्रग्रहण के दौरान विशेष कीर्तन एवं महाअभिषेक का आयोजन किया गया।

