कानपुर में स्ट्रीट डॉग का बढ़ता आतंक: बच्चे, बुजुर्ग और युवा दहशत में, रोज बढ़ रहे हमले के मामले

कानपुर। औद्योगिक नगरी कानपुर इन दिनों एक नई समस्या से जूझ रही है। शहर के अलग-अलग इलाकों में आवारा कुत्तों का आतंक लगातार बढ़ता जा रहा है। हालात ऐसे हैं कि बच्चे, बुजुर्ग ही नहीं बल्कि युवा वर्ग भी खुद को असुरक्षित महसूस कर रहा है। सुबह की सैर हो या देर शाम बाजार से लौटना, हर समय लोगों के मन में डर बना रहता है कि कहीं अचानक कुत्तों का झुंड हमला न कर दे।

शहर के कई प्रमुख क्षेत्रों—किदवई नगर, गोविंद नगर, स्वरूप नगर, कल्याणपुर, बर्रा, नौबस्ता और पनकी—में पिछले कुछ महीनों में कुत्तों के काटने की घटनाओं में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। स्थानीय अस्पतालों और स्वास्थ्य केंद्रों में एंटी-रेबीज इंजेक्शन लगवाने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है। डॉक्टरों के अनुसार, प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग कुत्तों के काटने की शिकायत लेकर पहुंच रहे हैं, जिनमें स्कूली बच्चे और बुजुर्ग अधिक हैं।

बच्चों पर सबसे ज्यादा खतरा

स्कूल जाने वाले बच्चों को सुबह और दोपहर के समय सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कई अभिभावकों ने बताया कि मोहल्लों में 5-7 कुत्तों के झुंड घूमते रहते हैं, जो साइकिल या पैदल जाते बच्चों पर भौंकते और दौड़ाते हैं। कुछ मामलों में बच्चों को काटने की घटनाएं भी सामने आई हैं। इससे अभिभावकों में भय का माहौल है और वे अपने बच्चों को अकेले बाहर भेजने से कतरा रहे हैं।

बुजुर्गों के लिए बढ़ी मुश्किलें

सुबह की सैर करने वाले बुजुर्गों को भी कुत्तों के हमले का डर सता रहा है। कई बुजुर्गों ने शिकायत की है कि जैसे ही वे छड़ी या लाठी लेकर निकलते हैं, कुत्ते उन्हें घेर लेते हैं। अचानक हमला होने से गिरने और गंभीर चोट लगने की आशंका बनी रहती है। कुछ मामलों में गिरने से हाथ-पैर टूटने की घटनाएं भी सामने आई हैं।

युवाओं और डिलीवरी बॉय पर भी खतरा

केवल बच्चे और बुजुर्ग ही नहीं, बल्कि युवाओं और डिलीवरी कर्मियों को भी समस्या का सामना करना पड़ रहा है। रात के समय काम से लौटते समय बाइक सवारों के पीछे कुत्तों का झुंड दौड़ पड़ता है, जिससे दुर्घटना की संभावना बढ़ जाती है। कई डिलीवरी एजेंटों ने बताया कि अंधेरी गलियों में कुत्ते अचानक हमला कर देते हैं, जिससे काम करना जोखिम भरा हो गया है।

क्यों बढ़ रही है समस्या?

विशेषज्ञों का मानना है कि शहर में कूड़े के ढेर, खुले में फेंका गया भोजन और पर्याप्त नसबंदी कार्यक्रम न होना इस समस्या की बड़ी वजह है। मोहल्लों में नियमित सफाई न होने के कारण कुत्तों को आसानी से भोजन मिल जाता है, जिससे उनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है। साथ ही, कई जगहों पर कुत्तों के झुंड आपस में लड़ाई करते हुए आक्रामक हो जाते हैं और राहगीरों पर हमला कर देते हैं।

नगर निगम की भूमिका पर सवाल

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि नगर निगम द्वारा आवारा कुत्तों की नसबंदी और पुनर्वास के लिए ठोस कार्रवाई नहीं की जा रही है। कई सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि शहर में व्यापक स्तर पर सर्वे कराया जाए और जहां कुत्तों की संख्या अधिक है, वहां विशेष अभियान चलाया जाए। लोगों का कहना है कि शिकायत करने के बावजूद कार्रवाई में देरी होती है।

कुछ पशु प्रेमी संगठनों का मानना है कि समस्या का समाधान केवल कुत्तों को पकड़ने से नहीं होगा, बल्कि उनके नियमित टीकाकरण, नसबंदी और भोजन प्रबंधन की समुचित व्यवस्था करनी होगी। साथ ही, लोगों को भी जागरूक करना होगा कि वे कुत्तों के साथ कैसा व्यवहार करें ताकि वे आक्रामक न हों।

शहरवासियों की मांग है कि प्रशासन स्कूलों के आसपास विशेष निगरानी रखे और सुबह-शाम पेट्रोलिंग बढ़ाई जाए। इसके अलावा, संवेदनशील क्षेत्रों में हेल्पलाइन नंबर जारी किए जाएं, ताकि किसी भी आपात स्थिति में तुरंत सहायता मिल सके।

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