कानपुर साउथ में सोमवार को कानून व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर देने वाली एक हैरान करने वाली घटना सामने आई। शहर की सड़कों पर कई लग्ज़री कारों का एक लंबा काफिला निकला, जिसमें सवार युवक और युवतियां खुलेआम ट्रैफिक नियमों की धज्जियां उड़ाते नजर आए। इस दौरान कारों से खिड़कियों के बाहर लटकना, तेज रफ्तार में ज़िगज़ैग ड्राइविंग करना, राहगीरों को खतरनाक तरीके से ओवरटेक करना, कारों को लहराना और लगातार तेज हॉर्न बजाना आम दृश्य बन गया।
सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि यह पूरा काफिला पुलिस चौकी के सामने से भी गुज़रा, लेकिन किसी भी प्रकार की तत्काल कार्रवाई होती नहीं दिखी। यह दृश्य न केवल राहगीरों के लिए डर पैदा करने वाला था, बल्कि सड़क पर चल रहे अन्य वाहन चालकों की जान को भी सीधे खतरे में डाल रहा था।
राहगीरों में दहशत, सड़क पर मची अफरा-तफरी
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, लग्ज़री कारों का यह काफिला अचानक तेज गति से सड़क पर आया। कुछ युवक-युवतियां चलती कारों की खिड़कियों से आधा शरीर बाहर निकालकर शोर मचा रहे थे, तो कुछ मोबाइल से वीडियो बनाते नजर आए। तेज रफ्तार और अनियंत्रित ओवरटेकिंग के कारण कई बार दुर्घटना जैसी स्थिति बन गई। बाइक सवार और पैदल चल रहे लोग खुद को बचाने के लिए किनारे हटने को मजबूर हुए।
पुलिस चौकी के सामने से गुज़रना, फिर भी सवाल
घटना का सबसे गंभीर पहलू यह है कि यह काफिला पुलिस चौकी के सामने से होकर गुज़रा। ऐसे में आम लोगों के मन में यह सवाल उठना लाज़मी है कि यदि यह सब पुलिस की मौजूदगी में हुआ, तो कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या रसूख, पैसे या लग्ज़री गाड़ियों का दबदबा कानून से ऊपर है?
अगर कोई हादसा होता तो जिम्मेदार कौन?
इस पूरी घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—यदि इस दौरान कोई बड़ा हादसा हो जाता, किसी राहगीर या वाहन चालक की जान चली जाती, तो उसकी जिम्मेदारी किसकी होती?
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स्टंट करने वाले युवक-युवतियों की?
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लग्ज़री कारों के मालिकों की?
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या फिर समय पर कार्रवाई न करने वाली पुलिस व्यवस्था की?
सड़क पर इस तरह के खतरनाक स्टंट न केवल भारतीय मोटर वाहन अधिनियम का खुला उल्लंघन हैं, बल्कि समाज में गलत संदेश भी देते हैं, जहां युवा कानून को मज़ाक समझने लगते हैं।
सोशल मीडिया दिखावे की होड़ या कानून से खिलवाड़?
सूत्रों की मानें तो ऐसे काफिले अक्सर सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल करने और ‘स्टाइल’ दिखाने के लिए निकाले जाते हैं। लेकिन यह दिखावा कब किसी मासूम की जान ले ले, इसका अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं है। बीते वर्षों में ऐसे कई मामले सामने आ चुके हैं, जहां स्टंटबाजी ने परिवारों को हमेशा के लिए उजाड़ दिया।

