नवदीप चतुर्वेदी : कानपुर में एक नवजात बच्ची की दर्दनाक मौत ने शहर की स्वास्थ्य व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है। आरोप है कि अस्पताल के नर्सिंग स्टाफ ने बच्ची को बेबी वार्मर में रखने के बाद उसकी निगरानी नहीं की और वह वहीं छूट गई। समय बीतने के साथ वार्मर का तापमान लगातार बढ़ता गया, जिससे अत्यधिक गर्मी के कारण बच्ची की जलकर मौत हो गई। यह घटना केवल एक अस्पताल की लापरवाही नहीं, बल्कि पूरे शहर में बिना मानकों के चल रहे अस्पतालों की भयावह तस्वीर पेश करती है।
बताया जा रहा है कि जिस बेबी वार्मर में नवजात को रखा गया था, उसकी नियमित मॉनिटरिंग नहीं की गई। मेडिकल नियमों के अनुसार, नवजात को वार्मर में रखने के बाद तापमान, अलार्म सिस्टम और शिशु की स्थिति पर लगातार नजर रखना अनिवार्य होता है। इसके बावजूद, इस मामले में नर्सिंग स्टाफ की घोर लापरवाही सामने आई है। यह लापरवाही किसी तकनीकी खराबी से नहीं, बल्कि मानवीय चूक और सिस्टम की नाकामी से जुड़ी बताई जा रही है।
इस घटना के बाद कानपुर में निजी अस्पतालों और नर्सिंग होम की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। शहर में बड़ी संख्या में ऐसे अस्पताल संचालित हो रहे हैं, जिनके पास न तो पूर्ण रूप से वैध पंजीकरण है और न ही जरूरी मानकों का पालन किया जा रहा है। स्वास्थ्य विभाग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, कई अस्पताल केवल पुराने या अधूरे लाइसेंस के सहारे चल रहे हैं, जबकि कुछ तो बिना किसी स्पष्ट अनुमति के ही वर्षों से मरीजों का इलाज कर रहे हैं।
सबसे गंभीर स्थिति फायर सेफ्टी को लेकर है। आरोप है कि कानपुर के कई अस्पतालों में न तो नियमित फायर ऑडिट कराया जाता है और न ही फायर सेफ्टी सिस्टम सक्रिय अवस्था में है। कई जगहों पर फायर एक्सटिंग्विशर या तो एक्सपायर हो चुके हैं या केवल दिखावे के लिए रखे गए हैं। कुछ अस्पतालों के पास फायर NOC तक नहीं है, इसके बावजूद वहां नवजात, गर्भवती महिलाएं और गंभीर मरीज भर्ती किए जा रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी परिस्थितियों में किसी भी समय बड़ा हादसा हो सकता है।
इसके साथ ही अस्पतालों में प्रशिक्षित स्टाफ की कमी भी एक बड़ी समस्या बनी हुई है। विशेष रूप से नवजात देखभाल से जुड़े विभागों में ऐसे स्टाफ की आवश्यकता होती है, जिन्हें बेबी वार्मर, वेंटिलेटर और अन्य संवेदनशील उपकरणों के संचालन का विशेष प्रशिक्षण मिला हो। लेकिन हकीकत यह है कि कई अस्पतालों में कम वेतन पर अप्रशिक्षित या अर्ध-प्रशिक्षित स्टाफ तैनात किया गया है। एक ही नर्स से कई वार्डों की जिम्मेदारी ली जाती है, जिससे निगरानी में चूक होना आम बात बनती जा रही है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि इस तरह की लापरवाही किसी एक व्यक्ति की गलती नहीं होती, बल्कि यह अस्पताल प्रबंधन की नीतियों और प्रशासनिक निगरानी की कमजोरी का नतीजा होती है। यदि अस्पतालों में तय मानकों के अनुसार स्टाफ की तैनाती, नियमित ऑडिट और सख्त निरीक्षण होता, तो इस तरह की दर्दनाक घटना को रोका जा सकता था।
अब सवाल स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन की भूमिका पर भी उठ रहे हैं। आखिर बिना फायर ऑडिट और फायर NOC के अस्पतालों को संचालन की अनुमति कैसे मिल रही है। कब और कितनी बार इन अस्पतालों का निरीक्षण किया गया, और यदि कमियां पाई गई थीं तो उन पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई। यह खामोशी अब संदेह के घेरे में आ गई है।
कानूनी जानकारों के अनुसार, यदि यह साबित होता है कि नवजात बच्ची की मौत लापरवाही और मानकों की अनदेखी के कारण हुई है, तो मामला गंभीर आपराधिक धाराओं में दर्ज किया जा सकता है। इसके बावजूद, अक्सर ऐसे मामलों में कार्रवाई केवल कागजी साबित होती है और कुछ समय बाद मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है।
नवजात बच्ची की यह मौत कानपुर के लिए एक कड़ी चेतावनी है। यह घटना बताती है कि शहर में इलाज के नाम पर चल रहे कई अस्पताल खुद मरीजों के लिए खतरा बन चुके हैं। जब तक बिना मानकों के चल रहे अस्पतालों पर सख्त कार्रवाई नहीं होगी, नियमित फायर ऑडिट और स्टाफ की योग्यता की जांच नहीं की जाएगी, तब तक ऐसी घटनाएं दोहराती रहेंगी।
यह मामला अब केवल एक अस्पताल या एक परिवार का नहीं रह गया है। यह पूरे शहर की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल है। अगर प्रशासन ने समय रहते इस ओर ध्यान नहीं दिया, तो कानपुर में इलाज कराना आम लोगों के लिए और भी बड़ा जोखिम बनता चला जाएगा।

