सलोनी तिवारी: सोमनाथ मंदिर पर हुए पहले विदेशी आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे होने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देशवासियों को संबोधित करते हुए एक भावनात्मक और ऐतिहासिक लेख लिखा है। अपने लेख में पीएम मोदी ने सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को भारत की अटूट आस्था, स्वाभिमान और सभ्यतागत चेतना का प्रतीक बताया है। उन्होंने कहा कि बार-बार हुए आक्रमणों के बावजूद सोमनाथ मंदिर आज भी पूरे गौरव के साथ खड़ा है, जो भारत माता की वीर संतानों के अदम्य साहस की कहानी कहता है।
प्रधानमंत्री मोदी 11 जनवरी को गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर के दर्शन के लिए जाएंगे और सोमनाथ स्वाभिमान पर्व में भी शामिल होंगे। इस अवसर पर 8 से 11 जनवरी तक मंदिर परिसर में कई आध्यात्मिक और सामाजिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाएगा।
सोमनाथ: आस्था और सभ्यता का शाश्वत प्रतीक
अपने लेख में पीएम मोदी ने लिखा कि सोमनाथ शब्द सुनते ही मन और हृदय में गर्व और श्रद्धा की अनुभूति होती है। गुजरात के प्रभास पाटन में स्थित यह ज्योतिर्लिंग भारत की आत्मा का शाश्वत प्रतीक है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख मिलता है—
“सौराष्ट्रे सोमनाथं च…”
यह इस पवित्र धाम की आध्यात्मिक और सभ्यतागत महत्ता को दर्शाता है।
1026 का आक्रमण और इतिहास की पीड़ा
प्रधानमंत्री ने अपने लेख में उल्लेख किया कि जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण कर उसे ध्वस्त कर दिया था। यह हमला केवल एक मंदिर पर नहीं, बल्कि भारत की आस्था, संस्कृति और सभ्यता पर किया गया एक बर्बर प्रयास था। पीएम मोदी ने इसे मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक बताया।
खंडहरों से पुनर्जन्म की गाथा
पीएम मोदी ने लिखा कि सोमनाथ मंदिर पर सैकड़ों आक्रमण हुए, लेकिन हर बार यह अपने ही खंडहरों से पहले से अधिक सशक्त होकर खड़ा हुआ। यही भारत की राष्ट्रीय चेतना और जीवनधारा है। उन्होंने कहा कि इन मंदिरों का पुनर्जागरण हमें गौरव से भर देता है और इससे अलग होना विनाश का कारण बन सकता है।
1951: पुनर्निर्माण और स्वाभिमान
प्रधानमंत्री ने याद दिलाया कि आज़ादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का संकल्प सरदार वल्लभभाई पटेल ने लिया था। 1947 में दीवाली के समय सोमनाथ यात्रा ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया और उन्होंने वहीं पुनर्निर्माण की घोषणा की।
11 मई 1951 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोले गए। संयोगवश, वर्ष 2026 न केवल पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे होने का वर्ष है, बल्कि मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी साक्षी है।
इतिहास में दर्ज एक निर्णायक क्षण
पीएम मोदी ने अपने लेख में यह भी उल्लेख किया कि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस समारोह को लेकर आशंकित थे, लेकिन राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद अपने निर्णय पर अडिग रहे। उनके इस कदम ने एक नया इतिहास रच दिया। साथ ही, प्रधानमंत्री ने के.एम. मुंशी के योगदान को भी स्मरण किया और उनकी पुस्तक ‘Somnath: The Shrine Eternal’ को अवश्य पढ़ने योग्य बताया।

