सलोनी तिवारी: दीपावली के अगले दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को गोवर्धन पूजा मनाने की परंपरा है। यह पर्व न केवल धार्मिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है बल्कि यह प्रकृति, गौ-सेवा और पर्यावरण संरक्षण का संदेश भी देता है।
गोवर्धन पूजा का महत्व
गोवर्धन पूजा को अन्नकूट उत्सव भी कहा जाता है। इस दिन भक्तजन भगवान श्रीकृष्ण की आराधना करते हैं और गोवर्धन पर्वत की पूजा करते हैं।
इस पूजा का उद्देश्य है —
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प्रकृति और अन्न के प्रति आभार जताना,
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गौमाता की सेवा करना,
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और भगवान श्रीकृष्ण द्वारा सिखाए गए “अहंकार त्याग” के संदेश को याद करना।
यह पर्व हमें बताता है कि मानव जीवन प्रकृति के सहारे है, इसलिए हमें उसकी रक्षा करनी चाहिए।
गोवर्धन पूजा की पौराणिक कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने जब देखा कि ब्रजवासी इंद्र देव की पूजा कर रहे हैं, तो उन्होंने पूछा — “क्या इंद्र हमारी खेती में मदद करते हैं?”
तब श्रीकृष्ण ने कहा, “हमें तो गोवर्धन पर्वत की पूजा करनी चाहिए जो हमें घास, जल और अन्न देता है।”
ब्रजवासियों ने श्रीकृष्ण की बात मानकर गोवर्धन पूजा की और इंद्र देव की पूजा बंद कर दी।
इससे इंद्र क्रोधित हो गए और उन्होंने तेज बारिश शुरू कर दी।
तब भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी कनिष्ठा उंगली पर गोवर्धन पर्वत उठा लिया और पूरे ब्रज को बारिश से बचाया।
सात दिन बाद इंद्र ने अपनी गलती मानी और श्रीकृष्ण से क्षमा मांगी।
तभी से हर साल गोवर्धन पूजा का पर्व मनाया जाता है।
गोवर्धन पूजा की विधि और परंपरा
इस दिन सुबह स्नान के बाद गौमाता के गोबर से गोवर्धन पर्वत का प्रतीक बनाकर उसकी पूजा की जाती है।
फूल, जल, दूध, दही, मिठाई, और विभिन्न पकवानों से अन्नकूट प्रसाद बनाया जाता है।
इसके बाद “गोवर्धन महाराज की जय” और “श्रीकृष्ण गोवर्धनधारी की जय” के जयकारे लगाए जाते हैं।
आधुनिक समय में संदेश
आज के समय में गोवर्धन पूजा का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है।
यह पर्व हमें याद दिलाता है कि —
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प्रकृति की पूजा ही सच्ची पूजा है।
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हमें अपने पर्यावरण, जल और पशुओं की रक्षा करनी चाहिए।
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गोवर्धन पूजा हमें समर्पण, सेवा और सादगी का मार्ग दिखाती है।
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। अंशिका मीडिया किसी भी प्रकार की पुष्टि नहीं करता। किसी भी मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।


