सलोनी तिवारी: सवाई माधोपुर जिले के चौथ का बरवाड़ा कस्बे में स्थित मां अम्बे का मंदिर, जिसे लोग चौथ माता के नाम से पूजते हैं, आस्था का प्रमुख केंद्र है। सुहागिन महिलाएं यहां दर्शन कर अपने पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं। यह मंदिर पहाड़ियों पर करीब एक हजार फीट की ऊंचाई पर विराजमान है।
किवदंती के अनुसार, एक बार चौथ माता ने एक महिला के पति को जीवनदान दिया था। तभी से महिलाएं चौथ माता की पूजा कर अपने पति की लंबी आयु की प्रार्थना करने लगीं। श्रद्धालुओं का मानना है कि चौथ माता भक्तों की हर मुराद पूरी करती हैं और कोई भी उनके दरबार से खाली हाथ नहीं लौटता।
करवा चौथ और हर माह की चौथ को महिलाएं यहां विशेष व्रत रखती हैं। व्रत रखने वाली महिलाएं दिनभर उपवास करती हैं और रात को चांद देखकर, माता को अर्क चढ़ाने के बाद अपने पति का चेहरा देखती हैं। पति के चेहरे में माता का रूप मानकर ही व्रत का समापन होता है।
इतिहास से जुड़ा महत्व
इस मंदिर के निर्माण की कहानी भी दिलचस्प है। कहा जाता है कि चौथ माता मंदिर की स्थापना वर्ष 1451 में तत्कालीन शासक भीमसिंह ने की थी। बाद में 1463 में मंदिर मार्ग पर बिजल की छतरी और पहाड़ी की तलहटी में तालाब का निर्माण करवाया गया। 16वीं शताब्दी में यह कस्बा चौहान वंश से मुक्त होकर राठौड़ वंश के अधीन आया और यहां भी माता के प्रति गहरी आस्था देखी गई।
चौथ माता व्रत की कथा
कहा जाता है कि युद्ध में मातेश्री नामक महिला के पति की मृत्यु हो गई थी। महिला सती होने की जिद पर अड़ी तो तत्कालीन शासक राव माधोसिंह ने सती प्रथा पर रोक लगाकर उसे सती नहीं होने दिया। महिला ने माता के दरबार में गुहार लगाई—”हे माता, या तो मुझे मृत्यु दो या मेरे पति को जीवनदान दो।” चौथ माता ने उसकी प्रार्थना स्वीकार कर उसके पति को जीवित कर दिया। तभी से राजस्थान की महिलाएं चौथ माता का व्रत करती हैं और करवा चौथ का उपवास रखकर पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं।
राव माधोसिंह ने चौथ का बरवाड़ा कस्बा माली समाज को गद्दी के रूप में भेंट कर दिया था। तभी से माता की पूजा-अर्चना का दायित्व माली समाज के हाथों में है।
आज भी साल भर यहां श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है और करवा चौथ जैसे विशेष अवसरों पर यह मंदिर भक्ति और आस्था का बड़ा केंद्र बन जाता है।


