सलोनी तिवारी: दशहरा, जिसे विजयदशमी भी कहा जाता है, हिंदू धर्म का एक प्रमुख त्योहार है। यह आश्विन मास की शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है और अच्छाई पर बुराई की विजय का प्रतीक माना जाता है। इस साल दशहरा 2 अक्टूबर को पूरे देशभर में धूमधाम से मनाया जाएगा। इस दिन विशेष रूप से रामलीला और रावण दहन का आयोजन किया जाता है।
क्यों मनाया जाता है दशहरा
रामायण के अनुसार, रावण ने माता सीता का अपहरण किया था। इसके बाद भगवान राम ने धर्म, सत्य और न्याय की रक्षा के लिए रावण से युद्ध किया और उसे पराजित किया। तभी से हर साल रावण दहन किया जाता है और इसे बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है।
रावण दहन पर शोक मनाने वाला समाज
हालांकि पूरे भारत में दशहरा बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है, लेकिन एक समाज ऐसा भी है जो इस दिन शोक मनाता है। यह है गोधा श्रीमाली समाज, जो खुद को रावण का वंशज मानता है। इस समाज के लोग दशहरे के दिन रावण दहन के धुएं को देखकर स्नान करते हैं और जनेऊ बदलने के बाद ही भोजन करते हैं।
मान्यता है कि त्रेतायुग में रावण का विवाह राजस्थान के मंडोर (जोधपुर) में हुआ था। उस समय बारात में आए गोधा परिवार के लोग यहीं बस गए और आज तक उनकी पीढ़ियाँ यहां निवास कर रही हैं। इसलिए दशहरे के दिन जब देशभर में रावण के पुतले जलाए जाते हैं, गोधा श्रीमाली समाज इसके विपरीत रावण की पूजा और श्रद्धांजलि करता है।
रावण का मंदिर और पूजा
राजस्थान के सूरसागर स्थित मेहरानगढ़ दुर्ग की तलहटी में रावण का एक प्राचीन मंदिर स्थित है। इसे गोधा श्रीमाली समाज के कमलेश दवे ने बनवाया था। दशहरे के दिन इस मंदिर को विशेष रूप से सजाया जाता है और यहां पूजा-अर्चना की जाती है।
मंदिर के पुजारी खुद को रावण का वंशज मानते हैं। उनका कहना है कि रावण केवल राक्षस राजा नहीं था, बल्कि वह वेदों का गहन ज्ञाता और अत्यंत बलशाली विद्वान था। संगीत में रुचि रखने वाले छात्रों को आज भी इस मंदिर में आकर रावण का आशीर्वाद लेने की परंपरा है।
हर साल सैकड़ों श्रद्धालु इस मंदिर के दर्शन करते हैं और रावण को श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।


