सलोनी तिवारी: अमेरिका और अफगानिस्तान का रिश्ता हमेशा से वैश्विक राजनीति का केंद्र रहा है। 2021 में अमेरिकी सेना की अफगानिस्तान से वापसी के बाद बगराम एयरबेस पूरी तरह तालिबान के कब्जे में चला गया था। यह एयरबेस न केवल अफगानिस्तान बल्कि पूरे मध्य एशिया के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद अहम माना जाता है। अब खबरें आ रही हैं कि अमेरिका, विशेषकर राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, फिर से बगराम एयरबेस पर नजर गड़ाए हुए हैं।
इस कदम को चीन के खिलाफ नई रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। बगराम एयरबेस, काबुल से लगभग 50 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है और यह चीन की सीमाओं के बेहद करीब है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ट्रंप प्रशासन वास्तव में अफगानिस्तान में वापसी की तैयारी कर रहा है? और अगर हाँ, तो इसका अमेरिका और बाकी दुनिया पर क्या असर पड़ेगा?

बगराम एयरबेस का सामरिक महत्व
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यह एयरबेस नाटो और अमेरिकी सेना का सबसे बड़ा ठिकाना था।
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सोवियत संघ के समय से ही इसका उपयोग सैन्य गतिविधियों के लिए होता रहा है।
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यह एयरबेस चीन, ईरान और पाकिस्तान की सीमा के पास स्थित है, जो अमेरिका को इन देशों पर निगरानी का बड़ा अवसर देता है।
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9/11 हमले के बाद अमेरिका ने इसी एयरबेस से अफगानिस्तान में अपनी प्रमुख सैन्य कार्रवाइयाँ संचालित की थीं।
ट्रंप की रणनीति: चीन पर नजर
विशेषज्ञों का मानना है कि अमेरिका के लिए अफगानिस्तान अब सीधे तौर पर “आतंकवाद” का मुद्दा नहीं है, बल्कि यह चीन पर रणनीतिक दबाव बनाने का हिस्सा है।
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चीन की बढ़ती मौजूदगी – चीन अफगानिस्तान में इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स और खनिज संसाधनों पर निवेश बढ़ा रहा है।
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BRI (Belt and Road Initiative) – चीन अफगानिस्तान को अपनी “वन बेल्ट वन रोड” परियोजना में शामिल करना चाहता है।
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निगरानी और दबाव – बगराम एयरबेस से अमेरिका चीन के शिनजियांग प्रांत पर भी आसानी से नजर रख सकता है।
तालिबान का विरोध
तालिबान ने अमेरिका की इस संभावित योजना को खारिज करते हुए कहा है कि “अफगानिस्तान की जमीन किसी विदेशी शक्ति को नहीं दी जाएगी।”
तालिबान का कहना है कि वे देश को फिर से “विदेशी कब्जे” में जाने नहीं देंगे।
अमेरिका के लिए फायदे
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चीन पर निगरानी – एयरबेस अमेरिका को चीन की गतिविधियों पर सीधा नजर रखने का मौका देगा।
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रणनीतिक दबाव – रूस और ईरान जैसे देशों पर भी दबाव डाला जा सकेगा।
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वैश्विक राजनीति में बढ़त – अमेरिका यह संदेश देगा कि एशिया से उसका प्रभाव खत्म नहीं हुआ।
अमेरिका के लिए नुकसान
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आर्थिक बोझ – फिर से सैन्य ठिकाना बनाने पर अरबों डॉलर खर्च होंगे।
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तालिबान से टकराव – इससे तालिबान और अमेरिका के बीच सीधा संघर्ष हो सकता है।
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स्थानीय असंतोष – अफगान जनता फिर से विदेशी हस्तक्षेप का विरोध कर सकती है।
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दुनिया में आलोचना – अमेरिका की छवि फिर से “हस्तक्षेप करने वाले देश” की बन सकती है।
अफगानिस्तान और क्षेत्रीय देशों की भूमिका
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पाकिस्तान – अमेरिका की इस रणनीति से पाकिस्तान असहज हो सकता है, क्योंकि उसका झुकाव अब चीन की तरफ अधिक है।
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ईरान – ईरान पहले से ही अमेरिका का विरोधी है, ऐसे में वह और आक्रामक हो सकता है।
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भारत – भारत के लिए यह स्थिति अवसर और चुनौती दोनों ला सकती है। एक ओर अमेरिका की मौजूदगी से आतंकवाद पर नियंत्रण में मदद मिलेगी, दूसरी ओर चीन और पाकिस्तान की नाराज़गी बढ़ सकती है।
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चीन – चीन इसे सीधी चुनौती मानेगा और कूटनीतिक व सैन्य दबाव बढ़ा सकता है।
ट्रंप का फायदा
डोनाल्ड ट्रंप की नजर केवल विदेश नीति पर ही नहीं, बल्कि अमेरिका की घरेलू राजनीति पर भी है। 2025 में वह ऐसे कदमों से अपनी सख्त और रणनीतिक छवि को मजबूत करना चाहते हैं। उनके समर्थक इसे “अमेरिका फर्स्ट” नीति का विस्तार मानते हैं।
अफगानिस्तान में अमेरिका की संभावित वापसी सिर्फ “आतंकवाद विरोध” की रणनीति नहीं है, बल्कि यह सीधे तौर पर चीन को घेरने की नीति का हिस्सा है।
बगराम एयरबेस अमेरिका को एशिया में रणनीतिक मजबूती देगा, लेकिन इसके साथ भारी आर्थिक और राजनीतिक जोखिम भी हैं।
अब देखना यह है कि ट्रंप प्रशासन तालिबान के विरोध और चीन की नाराज़गी के बावजूद यह कदम उठाता है या नहीं।
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