सलोनी तिवारी: भारतीय सेना का इतिहास साहस, त्याग और अनुशासन के कई स्वर्णिम अध्यायों से भरा हुआ है। इनमें से एक महत्वपूर्ण पड़ाव है ऑपरेशन सिंदूर, जिसकी कहानी हाल ही में भारतीय सेना प्रमुख जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने साझा की। यह मिशन न केवल सैन्य दृष्टि से, बल्कि रणनीतिक और राष्ट्रीय सुरक्षा के नजरिए से भी बेहद महत्वपूर्ण साबित हुआ।
88 घंटे का अद्वितीय अभियान
जनरल उपेंद्र द्विवेदी ने बताया कि ऑपरेशन सिंदूर लगातार 88 घंटे तक लहर की तरह चला। सेना ने इसमें ऐसी तत्परता और एकजुटता दिखाई, जिसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा।
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इस ऑपरेशन की खासियत यह रही कि भारतीय सेना ने बदलती परिस्थितियों में बेहद तेज, सटीक और साहसी निर्णय लिए।
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प्रत्येक सैनिक और अधिकारी ने अपने कर्तव्य को सर्वोच्च मानते हुए काम किया।
युद्ध के बाद भी क्यों ज़रूरी था ऑपरेशन सिंदूर?
जनरल द्विवेदी ने स्पष्ट किया कि 10 मई को पाकिस्तान के साथ शत्रुता समाप्त होने के बाद भी संघर्ष खत्म नहीं हुआ।
असल चुनौती तब शुरू हुई, जब युद्ध के बाद फैसले लेने थे।
किन मोर्चों को कब खाली करना है, किन इलाकों को सुरक्षित रखना है, कितनी ताकत और संसाधन तैनात करने हैं—ये सब सवाल लंबे समय तक सेना के सामने बने रहे।
उन्होंने कहा:
“आप सोच रहे होंगे कि 10 मई को युद्ध खत्म हो गया। नहीं! यह लंबे समय तक जारी रहा क्योंकि कई फैसले लेने बाकी थे। हर एक्शन और नॉन-एक्शन का लंबे समय तक प्रभाव रहा।”
सैन्य रणनीति और फैसलों की चुनौती
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेना को सबसे बड़ी चुनौती थी:
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समय का चुनाव – ऑपरेशन कब शुरू करना है और कब रोकना है।
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संसाधनों का प्रबंधन – कितनी ताकत लगानी है, किन हथियारों और टुकड़ियों को सक्रिय रखना है।
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मानव संसाधन – थके हुए सैनिकों को लगातार सक्रिय रखना, उनका मनोबल ऊँचा बनाए रखना।
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संचार व्यवस्था – दुश्मन की गतिविधियों पर नजर रखते हुए सुरक्षित तरीके से आदेश पहुंचाना।
ऑपरेशन का असर
इस ऑपरेशन का असर सिर्फ सीमित समय तक नहीं रहा बल्कि इसके दीर्घकालिक परिणाम हुए।
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सेना की तैयारी और तत्परता ने दुश्मन देशों को भारत की सैन्य शक्ति का एहसास कराया।
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इसने सरकार और रणनीतिक विशेषज्ञों को यह समझने का अवसर दिया कि युद्ध केवल मोर्चे पर लड़ी जाने वाली लड़ाई नहीं है, बल्कि इसके बाद के फैसले भी उतने ही महत्वपूर्ण होते हैं।
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सैनिकों का मनोबल ऊँचा हुआ और आम जनता के बीच सेना की प्रतिष्ठा और बढ़ी।
ऑपरेशन सिंदूर: सीख और प्रेरणा
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तेज़ निर्णय लेना ज़रूरी – युद्ध के बाद भी कई बार कठिन फैसले तेजी से लेने पड़ते हैं।
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लॉजिस्टिक्स और प्लानिंग की अहमियत – बिना ठोस योजना और संसाधनों के बड़ा ऑपरेशन सफल नहीं हो सकता।
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सैनिकों का जज्बा – अंततः जीत सैनिकों के साहस और समर्पण से ही तय होती है।
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कूटनीतिक संतुलन – युद्ध के बाद भी अंतरराष्ट्रीय दबाव और रिश्तों को संभालना उतना ही अहम है।
जनरल उपेंद्र द्विवेदी का संदेश
किताब ‘Operation Sindoor: Before and Beyond’ के विमोचन समारोह में जनरल द्विवेदी ने सेना की भूमिका को सराहा। उन्होंने कहा कि यह केवल एक सैन्य अभियान नहीं था, बल्कि एक मानसिक और रणनीतिक परीक्षा थी, जिसे भारतीय सेना ने शानदार तरीके से पास किया।
ऑपरेशन सिंदूर भारत की सैन्य शक्ति, सैनिकों की प्रतिबद्धता और राष्ट्र की रक्षा के प्रति उनके समर्पण का प्रतीक है। यह ऑपरेशन दर्शाता है कि युद्ध केवल मोर्चे तक सीमित नहीं होता, बल्कि उसके बाद भी कई कठिन और दूरगामी फैसले लेने पड़ते हैं।
जनरल उपेंद्र द्विवेदी की यह व्याख्या आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा है—कि चाहे हालात कितने भी मुश्किल क्यों न हों, भारतीय सेना हर बार देश को सुरक्षित रखने के लिए तैयार है।

