सलोनी तिवारी: अनंत चतुर्दशी हिंदू धर्म का महत्त्वपूर्ण व्रत है, जो भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाया जाता है। यह दिन गणेशोत्सव की समाप्ति का प्रतीक है, जब गणेशजी का पवित्र विसर्जन किया जाता है। इस अवसर पर भगवान विष्णु के अनंत रूप की पूजा और अनंत सूत्र का बांधना शुभ माना जाता है।
व्रत कथा: पांडवों का संकल्प और कौंडिन्य ऋषि की मोक्ष यात्रा
महाभारत के अनुसार, राजसूय यज्ञ के दौरान बनाए गए भव्य पांडव मंडप में दुर्योधन गलतफहमी में जल कुंड में गिर गया। द्रौपदी की व्यंग्यपूर्ण टिप्पणी से आहत होकर उसने पांडवों को जुए में हार दिलाई, जिसके कारण उन्हें बारह वर्ष का वनवास स्वीकार करना पड़ा।
वनवास के दौरान युधिष्ठिर ने प्रभु श्रीकृष्ण से अपनी वेदना व्यक्त की। तभी श्रीकृष्ण ने उन्हें अनंत चतुर्दशी का व्रत करने का सुझाव दिया, जो सच्ची श्रद्धा से किया जाए तो सभी दुःख मिटा देता है।
प्राचीन कथा में एक धर्मपरायण ब्राह्मण की कन्या सुशीला थी, जिसने अनंत व्रत का विधिपूर्वक पालन किया और अपने घर में समृद्धि ल्याई। लेकिन ऋषि कौंडिन्य ने उस व्रत सूत्र को मैं-झूठ मानते हुए आग में जला दिया, जिससे उन्हें विनाश का सामना करना पड़ा। पश्चाताप और वन विचरण के बाद, अनंत भगवान ने उन्हें दर्शन दिए और चौदह वर्षों तक व्रत करने पर उद्धार का वचन दिया। उनकी आज्ञा का पालन करने से ऋषि को मोक्ष और वैभव दोनों प्राप्त हुए।
युधिष्ठिर ने भी श्रीकृष्ण के कहने पर यह व्रत किया, जिससे उन्हें महाभारत युद्ध में विजय मिली और राज्य प्राप्त हुआ।
अनंत चतुर्दशी व्रत कथा: सुशीला और ऋषि कौंडिन्य की कथा
प्राचीन समय में सुमंत नाम का एक ब्राह्मण था। उसकी पत्नी दीक्षा बहुत धार्मिक थी। उनकी एक सुंदर और सुशील पुत्री थी जिसका नाम सुशीला था। जब सुशीला बड़ी हुई तो उसका विवाह ऋषि कौंडिन्य से हुआ।
विवाह के बाद सुशीला अपने पति कौंडिन्य के साथ नए घर की ओर जा रही थी। मार्ग में संध्या हो गई और वे नदी के तट पर रुक गए। कौंडिन्य नदी में स्नान और संध्या वंदन करने लगे।
इसी बीच, सुशीला ने देखा कि किनारे पर बहुत सी स्त्रियाँ सुंदर पूजा कर रही हैं। वे फूल, दीप, प्रसाद और एक विशेष धागे से भगवान की पूजा कर रही थीं। सुशीला ने जिज्ञासा से पूछा — “बहन! आप लोग किसकी पूजा कर रही हैं?”
उन स्त्रियों ने उत्तर दिया —
“आज अनंत चतुर्दशी का दिन है। इस दिन हम सब भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की पूजा करते हैं और ‘अनंत सूत्र’ (14 गांठों वाला पवित्र धागा) को हाथ में बाँधते हैं। इस व्रत से सुख, समृद्धि और सब प्रकार के कष्ट दूर होते हैं।”
सुशीला ने भी उसी समय व्रत करने का निश्चय किया। उसने विधि-विधान से पूजा की और अपने बाएँ हाथ में 14 गांठों वाला अनंत सूत्र बाँध लिया।
जब ऋषि कौंडिन्य ने सुशीला के हाथ में लाल-पीले धागे को देखा तो पूछा —
“यह धागा किसलिए बाँधा है?”
सुशीला ने श्रद्धा से पूरी कथा और व्रत का महत्व सुनाया। लेकिन कौंडिन्य ने इसे अंधविश्वास मानते हुए आग में फेंक दिया।
भगवान अनंत का अनादर होते ही उनके जीवन में विपत्ति आने लगी। सारी संपत्ति नष्ट हो गई, घर बर्बाद हो गया और सभी प्रयास विफल हुए।
कौंडिन्य ने धीरे-धीरे समझा कि यह उनके अहंकार और भगवान अनंत का अपमान करने के कारण हुआ। उन्होंने घर-परिवार छोड़कर कठोर तपस्या शुरू की।
एक दिन थक-हारकर प्राण त्यागने को तैयार हुए। तभी एक संत (भगवान विष्णु) प्रकट हुए और बोले:
“ऋषि! तुमने भगवान अनंत का अपमान किया था। यदि तुम 14 वर्षों तक सच्चे मन से अनंत चतुर्दशी का व्रत करोगे, तो सारी विपत्तियाँ दूर होंगी और पुनः सुख-समृद्धि प्राप्त होगी।”
ऋषि कौंडिन्य ने पूरे भक्ति भाव से 14 वर्षों तक व्रत किया। उनके जीवन की सारी परेशानियाँ समाप्त हुईं और उन्हें पुनः धन, सुख और समृद्धि प्राप्त हुई।
जैन धर्म में महत्व
जैन धर्म में अनंत चतुर्दशी का विशेष स्थान है। दिगंबर जैन भाद्रपद माह के अंतिम 10 दिनों में पर्युषण पर्व का पालन करते हैं। इस दिन भक्त कठोर उपवास रखते हैं और आत्मशुद्धि एवं तपस्या का संकल्प लेते हैं।
जैन परंपरा के अनुसार, इसी पावन दिन भगवान वासुपूज्य ने निर्वाण प्राप्त किया था। इसीलिए जैन समाज में यह पर्व अत्यंत पवित्र और मोक्षदायी माना जाता है।
पूजा विधि एवं महत्व
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श्री विष्णु की प्रतिमा स्नान और सज्जा के साथ पूजा करें।
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तुलसी, पुष्प, दीप, धूप, नैवेद्य अर्पित करें।
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अनंत सूत्र (14 गांठों वाली डोरी) बांधें।
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कथा का पाठ व्रत को पूर्णता प्रदान करता है।
अनंत चतुर्दशी व्रत से जीवन में खुशहाली, रक्षा और समृद्धि की कामना की जाती है। यह विश्वास और ईश्वर के प्रति समर्पण का प्रतीक है।
लाभ और उद्देश्य
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व्यर्थ के पापों का नाश और मोक्ष की प्राप्ति।
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जीवन में सुख, समृद्धि और वैभव की वृद्धि।
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समर्पण, विश्वास और सत्कर्मों का फलदायक अवसर।
डिस्क्लेमर: यहां दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित है। अंशिका मीडिया किसी भी प्रकार की पुष्टि नहीं करता। किसी भी मान्यता को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ की सलाह अवश्य लें।
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