सलोनी तिवारी: मानसिक स्वास्थ्य क्यों बना वैश्विक चिंता का विषय?
पिछले कुछ वर्षों में मानसिक स्वास्थ्य एक गंभीर सामाजिक और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दा बनकर सामने आया है। कोविड-19 महामारी, लॉकडाउन, आर्थिक अस्थिरता, रिश्तों में तनाव और जीवनशैली में बदलाव ने लोगों के मानसिक संतुलन पर गहरा असर डाला है। इसके परिणामस्वरूप तनाव (Stress), चिंता (Anxiety) और अवसाद (Depression) के मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है।
मानसिक स्वास्थ्य पर असर डालने वाले प्रमुख कारण
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लॉकडाउन और एकांतवास – लंबे समय तक घर में बंद रहने से सामाजिक संपर्क कम हो गया।
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आर्थिक असुरक्षा – नौकरी का जाना या आय का कम होना तनाव का बड़ा कारण रहा।
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स्वास्थ्य संबंधी डर – कोविड और अन्य बीमारियों को लेकर लोगों में भय बढ़ा।
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सोशल मीडिया और डिजिटल दबाव – लगातार ऑनलाइन रहना और तुलना की प्रवृत्ति मानसिक अस्थिरता बढ़ाती है।
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रिश्तों में तनाव – परिवार और व्यक्तिगत संबंधों में दूरी व टकराव भी अवसाद का कारण बने।
मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े बढ़ते आंकड़े
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया में लगभग 28 करोड़ लोग अवसाद (Depression) से जूझ रहे हैं।
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भारत में ही लगभग 14% लोग किसी न किसी मानसिक समस्या से प्रभावित हैं।
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महामारी के बाद युवाओं और महिलाओं में तनाव और अवसाद की दर तेज़ी से बढ़ी है।
मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के उपाय
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खुलकर बात करें – अपने दोस्तों, परिवार या काउंसलर से अपनी भावनाएँ साझा करें।
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व्यायाम और योग – नियमित शारीरिक गतिविधि तनाव कम करने और मस्तिष्क को शांत रखने में मदद करती है।
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संतुलित आहार – पौष्टिक भोजन मानसिक स्थिरता के लिए जरूरी है।
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नींद पूरी करें – 7-8 घंटे की नींद मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों के लिए अनिवार्य है।
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डिजिटल डिटॉक्स – मोबाइल और सोशल मीडिया पर समय कम बिताएँ।
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पेशेवर सहायता लें – यदि अवसाद गहरा हो, तो मनोचिकित्सक या काउंसलर की मदद अवश्य लें।
विशेषज्ञों की राय
मनोचिकित्सकों का कहना है कि मानसिक स्वास्थ्य को लेकर अभी भी समाज में कलंक (Stigma) है। लोग मदद लेने से कतराते हैं। लेकिन मानसिक बीमारियाँ उतनी ही वास्तविक हैं जितनी शारीरिक बीमारियाँ। समय रहते उपचार और परामर्श लेने से मरीज जल्दी स्वस्थ हो सकता है।
निष्कर्ष:
आज के समय में मानसिक स्वास्थ्य पर ध्यान देना उतना ही जरूरी है जितना शारीरिक स्वास्थ्य पर। हमें मानसिक समस्याओं को छुपाने के बजाय स्वीकार करना और समाधान ढूँढना चाहिए। एक सकारात्मक दृष्टिकोण, सहयोगी परिवार और सही चिकित्सा से जीवन फिर से सामान्य और खुशहाल हो सकता है।

