सलोनी तिवारी; लखनऊ, 20 अगस्त 2025: उत्तर प्रदेश राज्य फॉरेंसिक विज्ञान संस्थान (UPSIFS) में आयोजित एक सेमिनार में पूर्व न्यायाधीश तलवंत सिंह ने कहा कि आज की न्यायिक प्रक्रिया में डिजिटल सबूत निर्णायक भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जहाँ आँखों देखी गवाही उपलब्ध नहीं होती, वहाँ इंटरनेट ट्रांज़ैक्शन, सर्वर लॉग्स और वीडियो रिकॉर्डिंग जैसे तकनीकी दस्तावेज़ अदालत में सच्चाई तक पहुँचने के लिए अहम आधार बन रहे हैं।
26/11 केस का उदाहरण
पूर्व न्यायाधीश ने बताया कि 26/11 मुंबई आतंकी हमलों के दौरान अभियुक्त अजमल कसाब को सज़ा दिलाने में इंटरनेट ट्रांज़ैक्ट्स और डिजिटल ट्रेल्स की बड़ी भूमिका रही। इससे यह साबित हुआ कि तकनीकी सबूत पारंपरिक गवाही से भी अधिक मजबूत हो सकते हैं।
सरकार और अदालतों की पहल
उत्तर प्रदेश सरकार और अदालतें लगातार तकनीकी ढांचे को मजबूत करने पर काम कर रही हैं।
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वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग के ज़रिए गवाहों और पीड़ितों के बयान दर्ज करना अब सामान्य प्रक्रिया बनता जा रहा है।
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भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) और दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की धारा 273 के तहत डिजिटल गवाही को मान्यता दी जा रही है।
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CCTV फुटेज, डिजिटल लॉग्स, और रिकॉर्डेड कॉल्स को अब अदालतें प्राथमिक सबूत के रूप में स्वीकार कर रही हैं।
न्याय प्रणाली में पारदर्शिता
विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल सबूतों के इस्तेमाल से न्याय प्रणाली में पारदर्शिता, गति और विश्वसनीयता दोनों बढ़ रही है। चोरी, साइबर अपराध और वित्तीय धोखाधड़ी जैसे मामलों में अब डिजिटल सबूत निर्णायक कड़ी साबित हो रहे हैं।
निष्कर्ष
न्यायपालिका की कार्यवाही में डिजिटल तकनीक का बढ़ता उपयोग यह संकेत देता है कि भविष्य में अदालतों में पारंपरिक गवाही की तुलना में प्रमाणिक डिजिटल रिकॉर्ड ही सज़ा और बरी होने का मुख्य आधार होंगे।

