दिल्ली-NCR में कुत्तों का नियंकण—सुप्रीम कोर्ट का आदेश: आठ सप्ताह में सभी आवारा कुत्तों को शेल्टर भेजें

नई दिल्ली – हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली और आसपास के क्षेत्रों (नोएडा, गुड़गांव, गाजियाबाद) में आवारा कुत्तों की समस्या को देखते हुए सख्त निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्थानीय निकायों को आठ सप्ताह के भीतर सभी आवारा कुत्तों को पकड़कर सुरक्षित शेल्टर में स्थानांतरित करने का आदेश दिया है।

यह निर्णय बढ़ते रेबीज मामलों, खासकर बच्चों में संक्रमण को देखते हुए लिया गया है। जनवरी 2025 में देशभर में अकेले 4,30,000 कुत्तों के काटने की घटनाएं दर्ज हुई थीं, जबकि पूरे वर्ष 2024 में यह आंकड़ा 37 लाख तक पहुंचा था। भारत में अनुमानित 5.25 करोड़ आवारा कुत्ते हैं, जिनमें से केवल 80 लाख शेल्टरों में मौजूद हैं। दिल्ली में अकेले लगभग 10 लाख आवारा कुत्ते होने की संभावना है।

अदालत ने स्पष्ट निर्देश दिए कि पकड़े गए कुत्तों को पब्लिक जगहों पर वापस नहीं छोड़ा जाए, चाहे वे स्टेरिलाइज्ड हों या नहीं। कोर्ट का कहना था:
“बच्चों को रेबीज से बचाना सर्वोपरि है—किसी प्रकार की भौतिक या भावनात्मक बाधा नहीं होनी चाहिए।”

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अदालत को बताया कि “स्टेरिलाइजेशन मात्र जनसंख्या को नियंत्रित कर सकता है, लेकिन कुत्तों की रेबीज फैलाने की क्षमता को नहीं रोक सकता” ।


समर्थन और आलोचना

आलोचना
– संरक्षणवादियों और पशु-कल्याण कार्यकर्ताओं ने इस फैसले को “अप्रयुक्त” और “अवैज्ञानिक” बताया। कंजरवेशनिस्ट बहार दत्त ने इसे “व्यावहारिक नहीं” कहा, वहीं ‘Save A Stray’ की स्थापना के नेता विदित शर्मा ने वैक्सीन और स्टेरिलाइजेशन आधारित दीर्घकालिक उपायों की मांग की।

समीक्षा और समर्थन
– कई RWA (resident welfare associations) ने इस आदेश का समर्थन किया है, इसे सार्वजनिक सुरक्षा के लिए आवश्यक कदम बताया है।
– अभिनेता जानवी कपूर, वरुण धवन और विर दास सहित कई प्रसिद्ध हस्तियों ने इस निर्णय की आलोचना की है, इसे “कुत्तों के लिए मौत की वसीयत” बताया और नागरिकों से नर्सिंग सुविधाओं में सुधार की मांग की है।


निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश स्पष्ट रूप से नागरिक, खासकर बच्चों की सुरक्षा को प्राथमिकता देता है। हालांकि इसके पीछे का इरादा प्रशंसनीय है, लेकिन इसके व्यावहारिक कार्यान्वयन और पशु कल्याणीय प्रभावों पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। अब यह देखना रोचक होगा कि स्थानीय प्रशासन इस आदेश को लागू करने में कितना संतुलन बना पाता है—जहां जनता की सुरक्षा और जंतुवादी सहिष्णुता दोनों का ध्यान रखा जा सके।

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