भाई बहन का त्यौहार रक्षाबंधन बहुत खास होता है मैं भी बहुत खुश हो जाती थी उस दिन सुबह से ही घर पर पकवान बनाना अपनी नंद और बुआ जी का इंतजार फिर सबसे राखी बंधवाने के बाद मायके जाने की खुशी अलग ही होती थी परन्तु एक दिन ऐसा आया कि मेरा भाई एक बीमारी के चलते दुनिया से विदा हो गया और जब राखी का त्यौहार आया तो सुबह से ही मन नहीं लग रहा था लगता था सब खत्म हो गया मन उदास सा भाई को याद कर रहा था पर कुछ भी हो हम स्त्रियां घर की धूरी होती हैं ये सत्य ही है तो सुबह से काम में वैसे ही लगी थी पकवान भी बनाएं क्यों कि घर पर तो बहन बेटियां सभी आनी थी तो खुश भी दिखना था पर दिल के किसी कोने में उदासी थी बुझा बुझा सा चेहरा फिर भी सबका ख्याल रखना क्यों कि एक बहन होने के साथ एक बहु भी थी पत्नी भी थी और एक भाभी भी थी पर इन सब रूपों में कहीं न कहीं एक बहन उदास थी सब करते करते शाम हो गई तभी कुछ ऐसा हुआ जिसने मेरे उदास मन को खुशियों से भर दिया, मेरा भतीजा (भाई का बेटा) दरवाजे पे खड़ा था ऐसा लगा जैसे भाई ही आ गया हो वही छवि वही मुस्कराहट और उसके वो शब्द बुआ जी आई क्यों नहीं आप डैडी नहीं तो क्या ,मैं हूं न, मेरे उदास मन को खुश कर गए और उसने मुझे भाई की तरह गले से लगा लिया आज इस दृश्य को चार साल हो गए और मुझे आज भी रक्षाबंधन का त्यौहार खुश करता है और उसके वो शब्द कान में गूंजते है बुआ जी ,
‘ मैं हूं न ‘… स्टोरी राइटर:नीता अवस्थी (शक्ति संगिनी स्पेशल)


