मालेगांव विस्फोट केस: 17 साल बाद एनआईए कोर्ट का फैसला, सबूतों के अभाव में सभी आरोपी बरी

मुंबई: 2008 के मालेगांव बम विस्फोट मामले में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की विशेष अदालत ने शुक्रवार को बड़ा फैसला सुनाया। कोर्ट ने सबूतों के अभाव में सभी सात आरोपियों को बरी कर दिया। इनमें प्रमुख रूप से लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित, पूर्व भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और मेजर (सेवानिवृत्त) रमेश उपाध्याय शामिल हैं।

अदालत ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में असफल रहा कि विस्फोट में प्रयुक्त मोटरसाइकिल में ही बम रखा गया था। साथ ही, अदालत ने मेडिकल सर्टिफिकेट्स और घायलों की उम्र से जुड़े दस्तावेजों में हेराफेरी की बात भी मानी। फैसले के समय सभी आरोपी कोर्ट में मौजूद थे। फैसले के बाद उन्होंने कहा, “सत्य की जीत हुई है।”

कोर्ट का फैसला:
विशेष एनआईए कोर्ट ने बताया कि यह एक जटिल मामला था, जिसमें एक लाख से अधिक पन्नों के दस्तावेज और सबूत थे। कोर्ट ने दोनों पक्षों की अंतिम बहसें सुनने के बाद 19 अप्रैल को फैसला सुरक्षित रखा था। सुनवाई अप्रैल में ही पूरी हो गई थी, लेकिन मामले की संवेदनशीलता और दस्तावेजों की विशालता को देखते हुए कोर्ट को अतिरिक्त समय की आवश्यकता पड़ी।

केस की पृष्ठभूमि:
29 सितंबर 2008 को रमज़ान के पवित्र महीने और नवरात्रि से ठीक पहले महाराष्ट्र के मालेगांव में एक बम विस्फोट हुआ था, जिसमें 6 लोगों की मौत हो गई थी और 100 से अधिक लोग घायल हुए थे। यह इलाका सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील माना जाता है।

प्रारंभिक जांच महाराष्ट्र आतंकवाद निरोधक दस्ते (ATS) ने की थी, जिसे बाद में एनआईए को सौंप दिया गया। इस मुकदमे में अभियोजन पक्ष ने 323 गवाहों से पूछताछ की, जिनमें से 34 गवाह अपने पहले दिए गए बयानों से पलट गए थे।

आरोप और धाराएं:
आरोपियों पर गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम (UAPA), भारतीय दंड संहिता (IPC) और विस्फोटक अधिनियम की कई धाराओं के तहत केस दर्ज किया गया था। सभी आरोपी कई वर्षों से जमानत पर बाहर थे।

17 वर्षों की लंबी कानूनी लड़ाई और सुनवाई के बाद कोर्ट ने सभी आरोपियों को दोषमुक्त कर दिया। यह फैसला एक ऐसे मुकदमे का अंत है, जिसने वर्षों तक राजनीति, धर्म और सुरक्षा एजेंसियों के बीच बहस को जन्म दिया।

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